सुप्रीम कोर्ट ने महावीर मंदिर प्रबंधन विवाद पर सख्त टिप्पणी की
श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदायों के बीच मंदिर प्रबंधन को लेकर कानूनी लड़ाई पर कोर्ट ने समझदारी से काम लेने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के श्री महावीर जी जैन मंदिर के प्रबंधन विवाद पर श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदायों को विवाद समाप्त करने और धार्मिक भावनाओं का सम्मान करने की सलाह दी है। अदालत ने दोनों पक्षों से लिखित दलीलें मांगी हैं और मामले का फैसला सुरक्षित रखा है। विवाद राजस्थान सार्वजनिक ट्रस्ट अधिनियम, 1959 के तहत शुरू हुआ था जिसमें प्रबंधन समिति को लेकर कानूनी लड़ाई चल रही है।
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सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के श्री महावीर जी जैन मंदिर के प्रबंधन को लेकर श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदायों के बीच चल रहे विवाद पर सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने दोनों पक्षों को धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए समझदारी से काम लेने और मुकदमेबाजी को यहीं रोकने की सलाह दी।
कोर्ट की टिप्पणी और सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धार्मिक भावनाएं संवेदनशील होती हैं और भगवान महावीर के नाम पर इस तरह की मुकदमेबाजी से भगवान प्रसन्न नहीं होंगे। कोर्ट ने दोनों पक्षों से पूछा कि क्या वे उम्मीद करते हैं कि सुबह श्वेतांबर संप्रदाय पूजा-अर्चना करे और शाम को दिगंबर संप्रदाय अपने तरीके से अनुष्ठान करे। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत ने दोनों पक्षों को अगले आठ दिनों के भीतर अपनी लिखित दलीलें जमा करने का निर्देश दिया।
विवाद का कानूनी पक्ष
मंदिर प्रबंधन को लेकर यह विवाद राजस्थान सार्वजनिक ट्रस्ट अधिनियम, 1959 की धारा 40 के तहत दायर आवेदन से शुरू हुआ था, जिसमें दिगंबर समिति के अध्यक्ष और सचिव को हटाकर श्वेतांबर संप्रदाय की नई प्रबंधन समिति बनाने की मांग की गई थी। उप-खंड अधिकारी ने दिगंबर समिति के खिलाफ आवेदन को मंजूरी दी थी। ट्रायल कोर्ट ने 1991 के पूजा स्थल अधिनियम की धारा 4 के तहत कार्यवाही रोक दी थी। राजस्थान हाईकोर्ट ने माना कि ट्रस्ट अधिनियम के तहत दिया गया आदेश एक ‘डिक्री’ है, इसलिए इसके खिलाफ वैधानिक अपील की जा सकती है। दिगंबर समिति ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
पक्षों के तर्क
उन्होंने कहा कि धर्म संवेदनशील विषय है और इसी वजह से 1991 का अधिनियम बनाया गया। उन्होंने कहा कि धर्म प्रत्येक व्यक्ति के लिए निजी विषय है और अलग-अलग संप्रदायों में पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों का तरीका अलग हो सकता है। दीवान ने यह भी कहा कि मंदिर के पूजा स्थल को बदलने या उसका स्वरूप परिवर्तित करने की कोई मांग नहीं है।
कोर्ट की सलाह
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को समझदारी से काम लेने और विवाद को यहीं समाप्त करने की सलाह दी। कोर्ट ने कहा कि जिस भगवान के नाम पर दोनों पक्ष मुकदमा लड़ रहे हैं, क्या वह इस तरह की कानूनी लड़ाई से खुश होंगे। अदालत ने कहा कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाए बिना विवाद को संभालने की जरूरत है।
निचली अदालत ने 1991 के कानून के तहत कार्यवाही खत्म कर दी थी।
आर्यमा सुंदरम, वरिष्ठ अधिवक्ता
यह सिर्फ प्रबंधन का मामला है, इसलिए 1991 का कानून लागू नहीं होता।
दिगंबर पक्ष
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- अगले आठ दिनों के भीतर लिखित दलीलें कहां जमा करनी हैं?
- दलीलें सीधे सुप्रीम कोर्ट में जमा करनी हैं, जहां इस मामले की सुनवाई चल रही है।
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले में क्या अगला कदम होगा?
- कोर्ट दलीलों के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखे हुए है, जो आने वाले समय में सुनाया जाएगा।
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