छह गांवों की बाईसाओं ने रचा संस्कार और संस्कृति का भव्य संगम
राजस्थान के झिनझिनयाली, कुंडा, बईया, सिहड़ार, भाडली एवं देवड़ा गांवों की 571 बाईसाओं ने दो दिवसीय सांस्कृतिक व पारिवारिक आयोजन में भाग लिया। इसमें भजन संध्या, कलश यात्रा, बौद्धिक चर्चा एवं पारंपरिक खेल शामिल थे, जिनमें स्थानीय संस्कार और एकजुटता को प्रदर्शित किया गया। कार्यक्रम का समापन स्मृतिचिह्न वितरण एवं विदाई समारोह के साथ हुआ।
AI-निर्मित सार · पूरी ख़बर से पुष्टि करें
बाड़मेर। झिनझिनयाली के दाता मूलचंद जी की प्रोल में उदयसिंहोत परिवार के झिनझिनयाली, कुंडा, बईया, सिहड़ार, भाडली एवं देवड़ा—इन छह गांवों की कुल 571 बाईसाओं ने समारोह में उत्साहपूर्वक भाग लिया। दो दिवसीय आयोजन में परंपरा, संस्कार, संस्कृति और पारिवारिक एकजुटता का अद्भुत संगम देखने को मिला।
आयोजन के कार्यकर्ता महिपालसिंह कुंडा ने बताया कि प्रथम दिवस बाईसाओं के स्वागत के पश्चात भजन संध्या का आयोजन हुआ। प्रसिद्ध भजन गायक सेनीदान जी नेड़ान ने देवीय स्तुतियों एवं भजनों की प्रस्तुतियों से श्रद्धा और भक्ति का ऐसा वातावरण बनाया कि उपस्थित जनसमूह भाव-विभोर हो उठा। इसके साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं पारंपरिक नृत्यों की प्रस्तुतियों ने समारोह में चार चांद लगा दिए।
दूसरे दिन सुबह भव्य कलश यात्रा के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। कलश यात्रा गांव के एक छोर से प्रारंभ होकर अलेखपुरी जी मठ के दर्शन करते हुए संत राजऋषि दाता मूलचंद जी चौराहे पर पहुंची, जहां सभी ने मूर्ति के दर्शन किए। इसके बाद यात्रा पुनः दाता मूलचंद जी की प्रोल में पहुंचकर संपन्न हुई। यात्रा में सजे-धजे ऊंट-घोड़े आकर्षण का केंद्र रहे। पारंपरिक वेशभूषा में भाई-बहनों ने भाग लेकर राजस्थान की लोक संस्कृति की सुंदर झलक प्रस्तुत की। जगह-जगह ग्रामीणों द्वारा पुष्पवर्षा कर बहन-बेटियों का भव्य स्वागत किया गया।
इसके बाद प्रोल में बौद्धिक चर्चा का आयोजन हुआ, जिसमें संस्कारों एवं पारिवारिक मूल्यों के साथ वर्तमान समय की परिस्थितियों को लेकर विचार-विमर्श किया गया। पूर्व सरपंच गोरधनसिंह कुंडा ने मूल गांव झिनझिनयाली की स्थापना तथा परिवार के महापुरुषों के योगदान और उनके जीवन-आदर्शों पर प्रकाश डाला। वहीं तारेंद्रसिंह झिनझिनयाली ने संस्कार निर्माण के महत्व पर चर्चा करते हुए सभी बहन-बेटियों से क्षत्रिय युवक संघ से जुड़कर शिविरों में भाग लेने का आह्वान किया।
इसके पश्चात पारंपरिक खेलों का आयोजन किया गया, जिसमें सभी ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। अंत में सभी बाइसाओं को स्मृतिचिह्न भेंट कर भावपूर्ण विदाई समारोह के साथ दो दिवसीय आयोजन का समापन हुआ।
समारोह को सफल बनाने में सूरजकंवर भाटी, पूनमकंवर, निंबसिंह, शंभुसिंह, गुलाबसिंह, समुन्द्रसिंह, चंद्रवीरसिंह, विक्रमसिंह, तारेन्द्रसिंह,पहलादसिंह, खेतसिंह, जसवंतसिंह सहित अनेक भाइयों का विशेष सहयोग रहा। समारोह में छहों गांवों के गणमान्य नागरिकों एवं परिवारजनों की गरिमामयी उपस्थिति रही।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- भजन संध्या का आयोजन किसने किया था?
- भजन संध्या में प्रसिद्ध भजन गायक सेनीदान जी ने देवीय भजनों से कार्यक्रम को श्रद्धा एवं भक्ति का माहौल दिया।
- कलश यात्रा की शुरुआत और समाप्ति कहाँ हुई?
- कलश यात्रा गांव के एक छोर से शुरू होकर अलेखपुरी जी मठ के दर्शन के बाद दाता मूलचंद जी की प्रोल में समाप्त हुई।
- बौद्धिक चर्चा में किन विषयों पर विचार-विमर्श हुआ?
- संस्कारों, पारिवारिक मूल्यों और वर्तमान समय की परिस्थितियों पर चर्चा की गई।
- कार्यक्रम को सफल बनाने में कौन-कौन सहयोगी थे?
- सूरजकंवर भाटी, पूनमकंवर, निंबसिंह, शंभुसिंह, गुलाबसिंह समेत अनेक भाइयों ने सहयोग दिया।
- कार्यक्रम में पारंपरिक खेलों का क्या महत्व था?
- पारंपरिक खेलों ने कार्यक्रम में उत्साह को बढ़ाया और सभी ने उनमें भाग लेकर रंग जमा दिया।
AI-निर्मित · पूरी ख़बर से पुष्टि करें
50 free articles left today
0 of 50 free reads used today.
पाठकों की पसंद





Comments
0 threadsNo approved comments yet. Start the discussion.