डीग के पान्हौरी गांव में सांसद समेत बड़े नेता पहनते हैं सिली धोती
52 साल पुरानी विरासत को बेटे लोकेश और विशाल आगे बढ़ा रहे हैं
राजस्थान के डीग जिले के पान्हौरी गांव में बिहारी लाल सैन परिवार करीब 52 वर्षों से सिली धोती बनाता है, जो सांसद, विधायक और मुख्यमंत्री तक के लिए बनाई जाती है। परिवार के सदस्य लोकेश कुमार और विशाल सिंह इस पारंपरिक सिलाई को जारी रखे हुए हैं, और उनकी धोती दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में पहुंचती है।
AI-निर्मित सार · पूरी ख़बर से पुष्टि करें
डीग। राजस्थान के डीग जिले के पान्हौरी गांव में एक परिवार की सिली धोती की पहचान सांसद, विधायक और मुख्यमंत्री तक पहुंच चुकी है। करीब 52 साल से चल रहे इस काम को अब बिहारी लाल सैन के बेटे लोकेश कुमार और विशाल सिंह आगे बढ़ा रहे हैं।
पान्हौरी गांव की एक छोटी गली में बने कमरे में कपड़ा काटकर और सिलकर धोती तैयार की जाती है। यह धोती दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और महाराष्ट्र तक पहुंचती है। परिवार में धोती के अलावा कमीज, कुर्ता और पाजामा की भी सिलाई होती है, लेकिन धोती की सिलाई उनकी खास पहचान है।
लोकेश कुमार करीब 14 साल से सिलाई का काम कर रहे हैं और उनका परिवार पूरे जिले में धोती की सिलाई के लिए जाना जाता है। धोती की सिलाई में अनुभव और बारीकियों को समझना जरूरी होता है, इसलिए यह काम सामान्य नहीं माना जाता।
बिहारी लाल सैन ने 52 साल पहले इस सिलाई मशीन के साथ काम शुरू किया था। घर की परिस्थितियों के कारण पढ़ाई आगे नहीं बढ़ सकी, इसलिए उन्होंने सिलाई का काम अपनाया। धीरे-धीरे यह हुनर गांव से बाहर भी फैल गया।
लोकेश के छोटे भाई विशाल ने सरकारी नौकरी की तैयारी की, लेकिन नौकरी नहीं मिलने पर पिता के काम को संभालने का फैसला किया। विशाल ने सिलाई सीखी और अब दोनों भाई मिलकर परिवार की कारीगरी को आगे बढ़ा रहे हैं।
राजस्थान और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री समेत सांसद और विधायक इस परिवार की सिली धोती पहनते हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के पति के लिए भी यहां से धोती भेजी गई है। नेताओं को यह धोती पहनने में आरामदायक लगती है और यह पारंपरिक पहनावा सार्वजनिक कार्यक्रमों और धार्मिक आयोजनों में भी पहना जाता है।
सिली धोती की कीमत 300 से 400 रुपए के बीच होती है और इसके लिए करीब साढ़े चार मीटर कपड़े की जरूरत होती है। इस छोटे से कमरे से निकली धोती अब देश के कई हिस्सों में अपनी पहचान बना चुकी है।
यह परिवार बिना किसी बड़े ब्रांड या प्रचार के अपने काम के दम पर पहचान बना चुका है। बिहारी लाल सैन ने जिस काम को मजबूरी में चुना था, आज उसके बेटे उसे अपनी पसंद और रोजगार दोनों के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं। यह कहानी भारतीय कारीगरी की उस विरासत की मिसाल है जो पीढ़ियों से बिना प्रचार के अस्तित्व बनाए हुए है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- धोती सिलाई का काम परिवार में कैसे शुरू हुआ?
- बिहारी लाल सैन ने 52 साल पहले सिलाई मशीन के साथ काम शुरू किया क्योंकि पढ़ाई आगे नहीं बढ़ सकी थी।
- पान्हौरी गांव की धोती सिलाई में क्या खासियत है?
- धोती की सिलाई में अनुभव और बारीकियाँ समझना जरूरी होता है, जो इसे सामान्य काम नहीं बनाता।
- परिवार के अन्य सदस्य धोती सिलाई में कैसे जुड़ रहे हैं?
- लोकेश के छोटे भाई विशाल ने सरकारी नौकरी नहीं मिलने पर सिलाई सीखी और अब दोनों साथ काम करते हैं।
- सिली धोती को सार्वजनिक कार्यक्रमों में क्यों पसंद किया जाता है?
- नेताओं को यह धोती आरामदायक लगती है और यह पारंपरिक पहनावा धार्मिक और सार्वजनिक आयोजनों में पहना जाता है।
- परिवार ने किस तरह बिना ब्रांड या प्रचार के पहचान बनाई?
- अपने गुणवत्ता और मेहनत के दम पर यह परिवार पीढ़ियों से बिना बड़े प्रचार के काम कर रहा है।
AI-निर्मित · पूरी ख़बर से पुष्टि करें
50 free articles left today
0 of 50 free reads used today.
पाठकों की पसंद










Comments
0 threadsNo approved comments yet. Start the discussion.