हिंदी भाषा हमारी संस्कृति और भावनाओं की अभिव्यक्ति है
विद्यार्थियों ने हिंदी के महत्व पर निबंध प्रतियोगिता में विचार व्यक्त किए
सुपौल में हिंदी दिवस के अवसर पर विद्यार्थियों ने हिंदी को संचार के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, परंपरा और भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम बताया। कार्यक्रम में हिंदी के महत्व को समझाते हुए राजभाषा के रूप में इसके अधिक प्रयोग और सम्मान की आवश्यकता पर जोर दिया गया। निबंध प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने हिंदी भाषा की एकता और सांस्कृतिक पहचान में भूमिका पर अपने विचार व्यक्त किए।
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सुपौल में हिंदी दिवस के अवसर पर विद्यार्थियों ने हिंदी को केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और भावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बताया। कार्यक्रम में हिंदी के प्रति सम्मान और इसके अधिक प्रयोग का संदेश दिया गया।
विद्यार्थियों ने अपने वक्तव्य में हिंदी को भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीय पहचान से जोड़ते हुए इसके अधिकाधिक प्रयोग का संदेश दिया। इसके बाद राजभाषा के रूप में हिंदी भाषा के महत्व पर निबंध लेखन प्रतियोगिता आयोजित की गई। प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने हिंदी को भारत की एकता, संस्कृति और विविधता को जोड़ने वाली सशक्त भाषा के रूप में प्रस्तुत किया।
विद्यार्थियों ने अपने निबंधों के माध्यम से राजभाषा के रूप में हिंदी की भूमिका एवं उसके महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने हिंदी भाषा का सम्मान करने तथा अपने दैनिक जीवन में इसके अधिकाधिक प्रयोग के लिए प्रेरित किया। विद्यालय प्रशासक विश्वास चन्द्र मिश्र ने विद्यार्थियों के प्रयासों की सराहना करते हुए उन्हें हिंदी भाषा के प्रति सम्मान, गौरव एवं प्रेम की भावना बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया।
कार्यक्रम को ज्ञानवर्धक, प्रेरणादायक एवं उत्साहवर्धक बताया गया। हिंदी शिक्षक अभय कुमार झा, विनोद कुमार सिंह, संतोष कुमार झा एवं शिक्षिका काजल कुमारी ने कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोग दिया।
सर्वेश कुमार तिवारी ने कहा, "हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और भावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है।" हिन्दी शिक्षिका निशा ने बताया कि "ऐसे कार्यक्रम विद्यार्थियों में हिंदी भाषा के प्रति सम्मान और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव को मजबूत करते हैं।" डॉ. प्रहलाद मिश्रा ने कहा, "हिंदी हमारी राजभाषा है और यह लोगों की भावनाओं से सहजता से जुड़ने का माध्यम है।" रविकांत मिश्रा ने हिंदी को माथे की बिंदी की तरह हमारी पहचान को सुशोभित करने वाला बताया।
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