इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेटे-बहू की बेदखली पर ट्रिब्यूनल को दिया अधिकार
असाधारण परिस्थितियों में बुजुर्ग की सुरक्षा के लिए अंतिम उपाय के तौर पर बेदखली का आदेश संभव
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत बने ट्रिब्यूनल को बेटे और बहू को मकान से बेदखल करने का अधिकार दिया है, लेकिन इसे असाधारण परिस्थितियों में ही अंतिम उपाय के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। कोर्ट ने ट्रिब्यूनल को तीन महीने के भीतर फैसले का निर्देश दिया है और परिवार के विवादों की जांच ट्रिब्यूनल को सौंप दी है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानपुर के एक मामले में वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत गठित ट्रिब्यूनल को बेटे और बहू को मकान से बेदखल करने का अधिकार दिया है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यह शक्ति सामान्य दीवानी अदालत जैसी व्यापक नहीं है और इसे केवल असाधारण परिस्थितियों में बुजुर्ग की जान, माल और सम्मान की सुरक्षा के लिए अंतिम उपाय के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा।
कानपुर निवासी श्यामजी शुक्ला ने यशोदा नगर स्थित अपने मकान से पुत्र पीयूष शुक्ला और बहू प्रीति शुक्ला को बेदखल करने की याचिका एसडीएम सदर के समक्ष वरिष्ठ नागरिक अधिनियम की धारा 5 और 22 के तहत ट्रिब्यूनल में दायर की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि पुत्र और बहू उनके साथ दुर्व्यवहार, गाली-गलौज और मारपीट करते हैं, जिससे उनकी जान को खतरा है।
बचाव पक्ष ने दहेज की मांग पूरी न होने पर यह मुकदमा करने का दावा किया है, जबकि बहू ने घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के तहत अलग मुकदमा दायर किया है।
न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया कि वह बेटे के खिलाफ बेदखली पर तीन महीने के भीतर फैसला करे और बहू के मामले में भी कानून के अनुसार कार्रवाई करे। कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रिब्यूनल का बेदखली का अधिकार सामान्य दीवानी अदालत जैसा पूर्ण अधिकार नहीं है और इसे अंतिम उपाय के रूप में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
अगस्त के अंतिम सप्ताह में दिए गए आदेश में खंडपीठ ने ट्रिब्यूनल के उस आदेश को रद्द कर दिया था जिसमें बेदखली की मांग पर सुनवाई नहीं की गई थी। कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम परिवारों के बिखराव के इस दौर में बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए बनाया गया कल्याणकारी कानून है।
खंडपीठ ने बेटे-बहू और पिता के आरोप-प्रत्यारोपों की सच्चाई पर कोई टिप्पणी नहीं की और कहा कि यह तय करना ट्रिब्यूनल का काम है कि क्या बेदखली जरूरी है।
हाईकोर्ट ने 13 जनवरी 2026 के आदेश को रद्द करते हुए ट्रिब्यूनल को प्राथमिकता के आधार पर कार्यवाही पूरी करने का निर्देश दिया है।
यह मामला कानपुर नगर के थाना सेन पश्चिमपारा क्षेत्र के मकान से जुड़ा है। याची ने मकान को अपनी स्व-अर्जित संपत्ति बताया है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने बेटे और बहू पर लगाए गए आरोपों की सत्यता पर कोई निष्कर्ष नहीं दिया है।
इस बीच बहू ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत अलग मुकदमा दायर किया है, जिसके नतीजे का इंतजार ट्रिब्यूनल करेगा।
यह फैसला वरिष्ठ नागरिकों की जान, माल और सम्मान की सुरक्षा के लिए असाधारण परिस्थितियों में बेदखली का रास्ता खोलता है, लेकिन इसका इस्तेमाल अंतिम उपाय के रूप में ही किया जाएगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- बेदखली का अधिकार किन परिस्थितियों में मिलेगा?
- यह अधिकार केवल असाधारण परिस्थितियों में वृद्ध की जान, माल और सम्मान की सुरक्षा हेतु अंतिम उपाय के रूप में उपयोग होगा।
- बेटा और बहू के खिलाफ क्या आरोप हैं?
- बेटा और बहू पर वृद्ध के साथ दुर्व्यवहार, गाली-गलौज तथा मारपीट का आरोप है।
- बहू ने किन आधारों पर अलग मुकदमा दायर किया है?
- बहू ने घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के तहत अलग मुकदमा दायर किया है, जिसका नतीजा ट्रिब्यूनल का इंतजार करेगा।
- हाईकोर्ट ने बेटे-बहू के आरोपों पर क्या टिप्पणी की?
- कोर्ट ने आरोपों की सत्यता पर कोई निष्कर्ष नहीं दिया और यह तय करने का काम ट्रिब्यूनल को सौंपा।
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