बस्तर में अनोखी देव अदालत ने 35 देवी-देवताओं को उम्रकैद की सजा सुनाई
157 मामलों की सुनवाई में दोषी देव-शक्तियों पर पूजा और मान्यता पर स्थायी रोक लगाई गई
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में कोंडागांव जिले की देव अदालत ने 157 मामलों की सुनवाई कर 35 देवी-देवताओं को उम्रकैद की सजा सुनाई, जिसका अर्थ उनकी पूजा और मान्यता पर स्थायी रोक है। यह अदालत स्थानीय आदिवासी परंपरा और धार्मिक आस्था के आधार पर हानिकारक मानी जाने वाली देव-शक्तियों को दंडित करती है और भादो जात्रा के दौरान पुनः मामलों पर विचार करती है।
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छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में रविवार को एक अनोखी देव अदालत लगी, जिसमें 157 मामलों की सुनवाई हुई। इस अदालत ने 35 देवी-देवताओं को उम्रकैद की सजा सुनाई, जिसका अर्थ उनकी पूजा, स्थापना और मान्यता पर स्थायी रोक है।
कोंडागांव जिले की यह देव अदालत नौ परगना के ग्रामीणों की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। भादो जात्रा के मुख्य पुजारी सरजू राम गौर ने बताया कि समाज के लिए हानिकारक मानी जाने वाली देव-शक्तियों के मामले यहां लाए जाते हैं। लोक परंपरा और पुजारियों की अगुवाई में सुनवाई के बाद दोषी देव-शक्तियों पर फैसला सुनाया जाता है।
फैसला ढोल-मांदर की थाप, पुजारी के मंत्र और सदियों से चली आ रही आदिवासी आस्था के आधार पर होता है। इस दौरान देव-शक्तियों के प्रभाव और गांव की परिस्थितियों का भी मूल्यांकन किया जाता है। कुछ देव-शक्तियों को एक वर्ष की रिमांड पर भेजा गया है, जबकि कुछ को उम्रकैद की सजा दी गई है।
अगले वर्ष भादो जात्रा में मामले फिर अदालत में आते हैं और उसके बाद अंतिम निर्णय सुनाया जाता है। इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु साक्षी बनते हैं। केशकाल की भादो जात्रा केवल मेला नहीं, बल्कि बस्तर के आदिवासी समाज की सर्वोच्च अदालत मानी जाती है।
कुछ मामलों में देव-शक्तियों को बरी भी किया गया और उनके काम की अदालत ने सराहना की। यह पूरी प्रक्रिया श्रद्धा, लोकविश्वास और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था के बीच संपन्न होती है। दूर-दराज के गांवों से हजारों लोग इस न्याय को देखने आते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- देव अदालत का उद्देश्य क्या है?
- यह समाज के लिए हानिकारक मानी जाने वाली देव-शक्तियों के मामलों की सुनवाई करती है।
- सजा कैसे तय की जाती है?
- ढोल-मांदर की थाप, पुजारी के मंत्र और आदिवासी आस्था के आधार पर फैसला किया जाता है।
- भादो जात्रा का धार्मिक और सामाजिक महत्व क्या है?
- यह क्षेत्र के आदिवासी समाज की सर्वोच्च अदालत मानी जाती है और भारी संख्या में श्रद्धालु इक्ट्ठा होते हैं।
- देव शक्तियों की सुनवाई में ग्रामीणों की क्या भूमिका होती है?
- ग्रामीण और श्रद्धालु इस प्रक्रिया के साक्षी बनते हैं और दूर-दराज से न्याय देखने आते हैं।
- क्या सभी मामले दोषी ठहराए गए?
- नहीं, कुछ देव-शक्तियों को बरी किया गया और उनकी कार्यशैली की प्रशंसा भी हुई।
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