आरबीआई ने टाटा संस की एनबीएफसी डी-रजिस्ट्रेशन अर्जी खारिज की
केंद्रीय बैंक के फैसले से टाटा संस को तीन साल में शेयर बाजार में लिस्ट होना होगा
भारतीय रिजर्व बैंक ने टाटा संस की नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनी (एनबीएफसी) के डी-रजिस्ट्रेशन के आवेदन को खारिज कर दिया है, जिससे अब टाटा संस को अपर-लेयर एनबीएफसी के नियमों के तहत शेयर बाजार में लिस्टिंग अनिवार्य हो गई है। टाटा संस का एसेट साइज ₹1 लाख करोड़ से अधिक होने के कारण इसे 2025 तक लिस्टिंग पूरी करनी होगी।
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भारतीय रिजर्व बैंक ने टाटा संस की नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनी के रूप में डी-रजिस्ट्रेशन के लिए मार्च 2024 में दी गई अर्जी को खारिज कर दिया है। इस फैसले के बाद टाटा संस की शेयर बाजार में लिस्टिंग अब अनिवार्य हो गई है।
टाटा संस ने खुद को एनबीएफसी श्रेणी से बाहर करने के लिए यह आवेदन दिया था, लेकिन रिजर्व बैंक ने स्पष्ट किया कि कंपनी आवश्यक मानदंड पूरे नहीं करती। इस कारण मार्च 2024 में डी-रजिस्ट्रेशन की अर्जी को खारिज कर दिया गया।
आरबीआई के इस कड़े रुख से टाटा संस को अपर-लेयर एनबीएफसी के नियमों का पालन करना होगा, जिसमें शेयर बाजार में लिस्टिंग अनिवार्य है। इससे पहले टाटा संस ने वित्त वर्ष 2024 में ₹21,813 करोड़ का पूरा कर्ज चुका दिया था और खुद को नेट कैश पॉजिटिव कंपनी बताया था।
केंद्रीय बैंक के रिवाइज्ड फ्रेमवर्क के अनुसार, जिन एनबीएफसी का स्टैंडअलोन एसेट साइज ₹1 लाख करोड़ या उससे अधिक होता है, वे अपर-लेयर कैटेगरी में आते हैं। टाटा संस का एसेट साइज इस सीमा से काफी ऊपर है।
सितंबर 2022 में टाटा संस को पहली बार अपर-लेयर एनबीएफसी के रूप में वर्गीकृत किया गया था, जिसके तहत तीन साल के भीतर यानी सितंबर 2025 तक लिस्टिंग अनिवार्य थी। अर्जी पेंडिंग रहने के कारण कंपनी अब तक अनलिस्टेड थी, लेकिन आवेदन खारिज होने के बाद लिस्टिंग प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
टाटा संस की लिस्टिंग से आम निवेशकों को समूह की गैर-सूचीबद्ध कंपनियों में अप्रत्यक्ष निवेश का मौका मिलेगा, जिनमें एयर इंडिया, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स, टाटा डिजिटल और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स शामिल हैं।
इस फैसले से टाटा संस की अनलिस्टेड संपत्तियों को पारदर्शी बाजार आधारित मूल्यांकन मिलेगा, जिससे कंपनी के वैल्यूएशन में वृद्धि हो सकती है और मौजूदा शेयरधारकों के लिए वैल्यू अनलॉक होगी।
शापूरजी पलोनजी ग्रुप की टाटा संस में लगभग 18.4% हिस्सेदारी है। लिस्टिंग से उनके लिए हिस्सेदारी का सटीक बाजार मूल्य तय करना आसान होगा और भविष्य में फंड जुटाने या शेयर बेचने में लिक्विडिटी बढ़ेगी।
कंपनी के पास अब लिस्टिंग से बचने का विकल्प सीमित है क्योंकि ₹1 लाख करोड़ से अधिक एसेट वाली कंपनियों को अपर-लेयर दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता। हालांकि, टाटा संस इस फैसले के खिलाफ केंद्रीय बैंक से पुनर्गठन या समय-सीमा में राहत की अपील कर सकती है।
इस फैसले के बाद शेयर बाजार में टाटा संस की लिस्टिंग लगभग तय मानी जा रही है और निवेशक इस प्रक्रिया पर नजर बनाए हुए हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- टाटा संस ने डी-रजिस्ट्रेशन क्यों आवेदन किया था?
- कंपनी खुद को एनबीएफसी श्रेणी से बाहर करना चाहती थी ताकि लिस्टिंग की बाध्यता से मुक्त हो सके।
- टाटा संस की लिस्टिंग से निवेशकों को क्या लाभ होगा?
- निवेशक टाटा समूह की गैर-सूचीबद्ध कंपनियों में अप्रत्यक्ष रूप से निवेश कर सकेंगे।
- टाटा संस ने वित्त वर्ष 2024 में क्या आर्थिक उपलब्धि हासिल की?
- टाटा संस ने ₹21,813 करोड़ का पूरा कर्ज चुका दिया और नेट कैश पॉजिटिव कंपनी बनी।
- क्या टाटा संस इस फैसले के खिलाफ कुछ कर सकता है?
- कंपनी केंद्रीय बैंक से पुनर्गठन या समय-सीमा में राहत की अपील कर सकती है।
- शापूरजी पलोनजी ग्रुप की टाटा संस में कितनी हिस्सेदारी है?
- उनकी हिस्सेदारी लगभग 18.4% है, जिससे लिस्टिंग से उन्हें लिक्विडिटी बढ़ाने में मदद मिलेगी।
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