नागौर में निर्दलीयों ने बिगाड़ा BJP-कांग्रेस का बहुमत
त्रिशंकु बोर्ड की संभावना बढ़ी, सभापति की कुर्सी माली समाज के नाम पर चर्चा
नागौर में 30 से 35 प्रतिशत वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशी मजबूत स्थिति में हैं, जिससे भाजपा और कांग्रेस का बहुमत प्रभावित हो सकता है। इसके कारण त्रिशंकु बोर्ड बनने की संभावना बढ़ गई है और सभापति पद को लेकर राजनीतिक समीकरण चर्चा का विषय बने हुए हैं। 14 सितंबर को मतगणना के बाद अंतिम नतीजे सामने आएंगे।
AI-निर्मित सार · पूरी ख़बर से पुष्टि करें
नागौर। नागौर में 13 सितंबर की रात चुनावी चर्चाओं का बाजार गर्म रहा। स्थानीय लोग वार्डवार जीत-हार का गणित लगाते हुए निर्दलीयों की बढ़ती ताकत पर चर्चा कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, 30 से 35 प्रतिशत वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशी मजबूत स्थिति में हैं, जिससे त्रिशंकु बोर्ड बनने की संभावना बढ़ गई है।
नागौर के काठड़िया चौक पर देर रात तक लोग चुनाव परिणामों का आकलन करते रहे। मिठाई की दुकानों से लेकर चौराहों तक हर जगह वार्डवार गणित की चर्चा चल रही थी। कोई भाजपा और कांग्रेस के बहुमत की बात कर रहा था तो कोई निर्दलीयों को निर्णायक मान रहा था।
चर्चा अब व्यापार, सड़क-सफाई या विकास के बजाय संभावित सभापति और बोर्ड के समीकरणों पर केंद्रित हो गई है। शहर में सक्रिय अनधिकृत सट्टा बाजार में भी हार-जीत के भाव को लेकर चर्चा जारी है। सट्टा बाजार से जुड़े लोगों के अनुसार मतदान से पहले फेवरेट पार्टी की स्थिति में बदलाव आया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि करीब 30 से 35 प्रतिशत वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशी मजबूत हैं। इनमें वे भी शामिल हैं जिन्होंने भाजपा और कांग्रेस से टिकट न मिलने पर बगावत कर चुनाव लड़ा। यदि निर्दलीय बड़ी संख्या में जीतते हैं तो दोनों प्रमुख दलों का बहुमत बिगड़ सकता है।
इस वजह से सभापति की कुर्सी को लेकर संभावित जोड़-तोड़ की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। जातीय समीकरणों में माली समाज से सभापति का चेहरा सामने आने की संभावना जताई जा रही है। सभापति कौन होगा, यह चुनाव परिणाम और राजनीतिक समीकरण तय करेंगे।
फिलहाल ये सभी आकलन और चर्चाएं अनधिकृत कयास और स्थानीय फीडबैक पर आधारित हैं। 14 सितंबर को मतगणना के बाद साफ होगा कि निर्दलीय प्रत्याशी त्रिशंकु बोर्ड बनाते हैं या भाजपा-कांग्रेस में से कोई एक बहुमत हासिल करता है।
शहर की मिठाई की गलियों से लेकर चौराहों तक चुनावी चर्चा का बाजार अभी भी गर्म है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- निर्दलीय प्रत्याशियों की ताकत क्यों बढ़ रही है?
- कुछ निर्दलीय भाजपा-कांग्रेस से टिकट न मिलने पर बगावत कर चुनाव लड़ रहे हैं।
- चुनावी चर्चा का मुख्य केंद्र क्या बन गया है?
- चर्चा अब व्यापार या विकास के बजाय सभापति पद और राजनीतिक समीकरणों पर केंद्रित हो गई है।
- निर्दलीयों की बढ़त से क्या प्रभाव पड़ सकता है?
- निर्दलीयों की अधिक जीत से भाजपा और कांग्रेस दोनों के बहुमत बिगड़ सकते हैं और गठबंधन की जरूरत पड़ सकती है।
AI-निर्मित · पूरी ख़बर से पुष्टि करें
50 free articles left today
0 of 50 free reads used today.
पाठकों की पसंद





Comments
0 threadsNo approved comments yet. Start the discussion.