हाई कोर्ट ने गुंडा एक्ट के दुरुपयोग पर रोक लगाई
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गोंडा डीएम के आदेश को निरस्त किया, कहा कानून का गलत इस्तेमाल न हो
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गोंडा के अधिकारी द्वारा जारी गुंडा एक्ट के तहत आदेश को रद्द कर दिया है और कहा है कि बिना उचित सुनवाई और दोषसिद्धि के मुकदमा दर्ज करना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। कोर्ट ने निष्कासन आदेश को निरस्त करते हुए गुंडा एक्ट का दुरुपयोग न करने की चेतावनी दी है और इस कानून को केवल स्पष्ट मामलों में लागू करने को कहा है।
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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गुंडा एक्ट के दुरुपयोग पर सख्त टिप्पणी करते हुए गोंडा के एक अधिकारी द्वारा जारी आदेश को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि दोषमुक्त व्यक्ति के खिलाफ उसी मुकदमे को आधार नहीं बनाया जा सकता और सूचना पर बिना सुनवाई मुकदमा दर्ज करना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
कोर्ट ने गोंडा निवासी जाहिद अली के निष्कासन आदेश को रद्द करते हुए कहा कि महज 2020 के एक आपराधिक मामले में संलिप्तता से किसी व्यक्ति को आदतन अपराधी नहीं माना जा सकता। अदालत ने पाया कि 2010 के मामले में जाहिद अली को 2017 में बरी कर दिया गया था, जबकि 2026 में उसे गुंडा घोषित किया गया। दोनों मामलों के बीच छह वर्ष का अंतर होने के कारण तर्कसंगत संबंध नहीं बनता।
न्यायालय ने पुलिस की बीट सूचना रिपोर्ट को भी पर्याप्त आधार मानने से इनकार किया और कहा कि ऐसी रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा। आयुक्त द्वारा पहले बरी किए गए मुकदमे को लंबित मामलों में शामिल करना विवेक की कमी का उदाहरण है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गुंडा एक्ट एक शक्तिशाली कानून है जिसे केवल बेहद स्पष्ट मामलों में, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए सावधानी से लागू किया जाना चाहिए। यह कानून निर्दोषों के उत्पीड़न का हथियार नहीं हो सकता।
जिलाधिकारी ने 11 मई को गुंडा एक्ट की धारा 3(1) के तहत यह कार्रवाई की थी, जिसमें आधार में दो मुकदमों और एक बीट सूचना रिपोर्ट का उल्लेख था। हाई कोर्ट ने इस कार्रवाई को निरस्त कर दिया।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- गुंडा एक्ट के क्या न्यायिक सिद्धांत हैं?
- कोर्ट ने कहा कि सूचना पर बिना सुनवाई मुकदमा दर्ज करना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है और यह कानून निर्दोषों के उत्पीड़न का हथियार नहीं होना चाहिए।
- जाहिद अली के मामले में कोर्ट ने क्या तर्क दिया?
- कोर्ट ने बताया कि 2010 और 2026 के मामलों के बीच छह साल का अंतर है, इसलिए उन्हें एक साथ जोड़कर गुंडा घोषित नहीं किया जा सकता।
- पुलिस की बीट सूचना रिपोर्ट को कोर्ट ने कैसे देखा?
- कोर्ट ने बताया कि ऐसी रिपोर्ट पर कार्रवाई करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है और इसे पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।
- गुंडा एक्ट को कब और कैसे लागू किया जाना चाहिए?
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह शक्तिशाली कानून केवल बेहद स्पष्ट मामलों में और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए सावधानी से लागू किया जाना चाहिए।
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