भरतपुर के चौबुर्जा गणेश मंदिर में विराजमान दो जुड़वा गणेश प्रतिमाएं
लगभग 300 साल पुराने इस मंदिर की युद्धकालीन परंपराएं और शाही हाथी की कहानी आज भी जीवित है
भरतपुर के चौबुर्जा गणेश मंदिर में लगभग 300 साल पुरानी दो जुड़वा गणेश प्रतिमाएं स्थापित हैं, जिन्हें स्थानीय लोग लोहागढ़ किले का 'अभय कवच' मानते हैं। महाराजा सूरजमल और उनकी सेना युद्ध से पहले इस मंदिर में आशीर्वाद लेते थे, और मंदिर से जुड़ी शाही हाथी की परंपरा भी यहां की खास पहचान है।
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भरतपुर। भरतपुर के चौबुर्जा क्षेत्र में स्थित करीब 300 साल पुराने गणेश मंदिर में दो गणेश प्रतिमाएं एक साथ विराजमान हैं। महाराजा और उनकी सेना युद्ध के लिए निकलने से पहले यहां आशीर्वाद लेते थे। मंदिर की युद्धकालीन परंपराएं और शाही हाथी की परंपरा इसे खास पहचान देती हैं।
भरतपुर के लोहागढ़ किले के बाहर घने जंगल हुआ करते थे। तत्कालीन महाराजा सूरजमल जब किले के द्वार से बाहर निकलते थे तो आसपास जंगली जानवर दिखाई देते थे। इसलिए किले से निकलते ही भगवान गणेश के दर्शन हों, इस उद्देश्य से चौबुर्जा क्षेत्र में गणेश मंदिर की स्थापना कराई गई।
मंदिर में विराजमान दो गणेश प्रतिमाएं स्थानीय मान्यता में लोहागढ़ का 'अभय कवच' मानी जाती हैं। युद्ध की शुरुआत से पहले योजना थी कि एक प्रतिमा चौबुर्जा में स्थापित की जाएगी और दूसरी को किसी अन्य स्थान पर ले जाकर स्थापित किया जाएगा, लेकिन युद्ध की परिस्थितियों के कारण दूसरी प्रतिमा को निर्धारित स्थान तक ले जाना संभव नहीं हो सका। इसलिए दोनों प्रतिमाओं की स्थापना यहीं कर दी गई और विधि विधान के साथ उनकी प्राण प्रतिष्ठा हुई।
महाराजा और उनकी सेना युद्ध के लिए रवाना होने से पहले यहां गणेशजी के दर्शन कर आशीर्वाद लेते थे। मान्यता थी कि गणेशजी का आशीर्वाद लेकर सेना विजय प्राप्त करके लौटेगी। लोहागढ़ ने अंग्रेजों और मुगलों के हमलों का लंबे समय तक सामना किया और इसे देश के मजबूत दुर्गों में गिना जाता है।
मंदिर से जुड़ी परंपराएं अनोखी हैं। आरती के लिए किले के महल से गंगाजल लेकर शाही हाथी मंदिर तक आता था। कहा जाता है कि शाही हाथी अपनी सूंड में गंगाजल से भरी बाल्टी उठाकर किले से मंदिर तक पहुंचता था। आरती के बाद पुजारी उस गंगाजल से भगवान गणेश का पूजन और अभिषेक करते थे। इसके बाद प्रसादी तैयार की जाती और बर्तन को ढककर बाहर रख दिया जाता था। यह दृश्य उस समय राजपरिवार और मंदिर के बीच धार्मिक संबंध की अनूठी तस्वीर पेश करता था।
शाही व्यवस्था खत्म होने और युद्धों के इतिहास बनने के बाद भी चौबुर्जा के गणेश मंदिर की आस्था कायम है। श्रद्धालु आज भी बड़ी श्रद्धा से यहां पूजा करने आते हैं। सामान्य तौर पर एक मंदिर में एक देवी-देवता की एक ही मूर्ति विराजमान रहती है, लेकिन इस मंदिर में दो गणेश प्रतिमाएं होने से यह अलग पहचान रखता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- दो गणेश प्रतिमाएं मंदिर में क्यों हैं?
- युद्ध की परिस्थिति के कारण दूसरी प्रतिमा को निर्धारित स्थान तक नहीं ले जाया जा सका था।
- पूजा के बाद क्या विशेष होता था?
- पुजारी गंगाजल से गणेशजी का अभिषेक करते थे और प्रसादि को बाहर रख देते थे।
- मंदिर की पूजा आज भी क्यों लोकप्रिय है?
- शाही व्यवस्था खत्म होने के बावजूद श्रद्धालु बड़ी श्रद्धा से यहां पूजा करने आते हैं।
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