सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दी
कोर्ट ने कहा कि कंपनी कानूनी इकाई होते हुए भी अभियोजन का सामना कर सकती है
सुप्रीम कोर्ट ने सैनोफी इंडिया लिमिटेड के खिलाफ सीबीआई जांच से जुड़े मामले में मुकदमा चलाने की अनुमति दी है। यह मामला भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के लिए दवाओं की खरीद में कथित अनियमितताओं से संबंधित है और सात साल से अधिक समय से लंबित था। कोर्ट ने कहा कि कंपनी को आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराने के लिए किसी व्यक्ति को आरोपी बनाना जरूरी नहीं है।
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सुप्रीम कोर्ट ने सैनोफी इंडिया लिमिटेड के खिलाफ सीबीआई की जांच से जुड़े मामले में फैसला सुरक्षित रखने से इनकार किया। यह मामला सात साल से अधिक समय से लंबित था।
फैसले में देरी और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दो साल से अधिक समय तक फैसला सुरक्षित रखा था। करीब तीन महीने पहले ही कोर्ट ने हाईकोर्ट समेत अन्य संवैधानिक अदालतों में फैसलों को सुनाने के लिए अधिकतम तीन महीने की समयसीमा तय की थी। कोर्ट ने कहा कि अगर फैसला तीन महीने से अधिक समय तक लंबित रहता है तो संबंधित चीफ जस्टिस को इसकी जानकारी दी जाएगी और वे मामले को अन्य पीठ के पास भेज सकते हैं। यह निर्देश संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत दिए गए हैं।
कोर्ट ने न्यायिक देरी को पक्षकारों के अधिकारों को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, खासकर उन मामलों में जहां किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल हो। इस साल की शुरुआत में भी सुप्रीम कोर्ट की तीन अन्य पीठों ने ऐसे फैसले सुनाए थे जो 11 महीने या उससे अधिक समय से सुरक्षित थे। इससे पता चलता है कि देरी की समस्या सिर्फ हाईकोर्ट तक सीमित नहीं है।
मामले का विवरण और कोर्ट का फैसला
यह मामला मैसूरु स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के लिए दवाओं की खरीद में कथित अनियमितताओं से जुड़ा है, जिसमें सरकार को 3.53 लाख रुपये का नुकसान बताया गया था। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कंपनी के खिलाफ सीबीआई की भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी की जांच से जुड़े मामले को रद्द करने से इनकार किया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कंपनी को आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराने के लिए उसके कामकाज के लिए जिम्मेदार किसी प्राकृतिक व्यक्ति की पहचान या उसे आरोपी बनाना हर स्थिति में जरूरी नहीं है। हालांकि, केवल आरोप लगाना पर्याप्त नहीं होगा कि कंपनी ने अपराध किया या उसमें आपराधिक मंशा थी।
सैनोफी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा और सीबीआई की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू पेश हुए। मामला सात साल से अधिक समय से सुप्रीम कोर्ट में लंबित था और 2019 के आदेश के बाद बेंगलुरु की सीबीआई अदालत में चल रही कार्यवाही पर रोक लगी हुई थी।
कंपनी एक कानूनी इकाई होने के बावजूद अभियोजन का सामना कर सकती है
सुप्रीम कोर्ट, पीठ
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- कोर्ट ने फैसले की समयसीमा क्यों तय की है?
- कोर्ट ने यह समयसीमा इसलिए तय की है ताकि न्यायिक देरी पक्षकारों के अधिकारों को प्रभावित न करे, खासकर ऐसे मामलों में जहां स्वतंत्रता का सवाल हो।
- क्या कंपनी के खिलाफ किसी व्यक्ति को आरोपी बनाना जरूरी है?
- कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कंपनी को आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराने के लिए किसी प्राकृतिक व्यक्ति को आरोपी बनाना हर स्थिति में जरूरी नहीं है।
- केंद्र सरकार इस मामले में क्या कार्रवाई कर सकती है?
- सरकार इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया का पालन करते हुए सीबीआई जांच और अदालत के फैसले का इंतजार करेगी।
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