संत कीर्तिराम महाराज ने चातुर्मास में परमात्मा का स्वरूप समझाया
रामद्वारा में सत्संग में बताया कि परमात्मा दृश्य नहीं, बल्कि दृश्य के आधार हैं
रामद्वारा के कान्हड़दास धाम में चातुर्मास के दौरान संत कीर्तिराम महाराज ने परमात्मा के स्वरूप पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि परमात्मा किसी वस्तु के रूप में नहीं बल्कि समस्त प्रकाश के स्रोत हैं और उन्हें निर्मल मन, विवेक और आत्मानुभूति से जाना जा सकता है। उन्होंने कहा कि परमात्मा प्रत्येक जीव के हृदय में सदैव विद्यमान हैं और साधना का उद्देश्य अज्ञानता को दूर करना है।
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कान्हड़दास धाम। कान्हड़दास धाम रामद्वारा में चल रहे चातुर्मास के दौरान रामस्नेही संत कीर्तिराम महाराज ने परमात्मा के स्वरूप पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि परमात्मा को किसी वस्तु की तरह देखना अज्ञानता है और वे केवल प्रकाश नहीं, बल्कि समस्त प्रकाश के स्रोत हैं।
संत कीर्तिराम महाराज ने बताया कि इंद्रियां केवल अपने-अपने विषयों तक सीमित हैं। आंखें रूप देख सकती हैं और कान शब्द सुन सकते हैं, लेकिन परमात्मा इंद्रियों के विषय नहीं हैं। उन्हें निर्मल मन, सूक्ष्म विवेक और आत्मानुभूति से जाना जा सकता है।
उन्होंने समझाया कि दृश्य वह है जिसे देखा जा सके और जिसकी कोई सीमा या आकार हो। वे स्वयं किसी रूप में बंधे नहीं हैं, लेकिन संसार में दिखाई देने वाले प्रत्येक रूप के अस्तित्व का आधार वही हैं। इसलिए परमात्मा को किसी बाहरी वस्तु की तरह देखने के बजाय उनके वास्तविक स्वरूप को समझना आवश्यक है।
परमात्मा प्रत्येक जीव के हृदय में आत्मस्वरूप के रूप में सदैव विद्यमान हैं। वे बाहर से प्राप्त होने वाली कोई वस्तु नहीं, बल्कि सदा सिद्ध हैं। साधना का उद्देश्य परमात्मा को प्राप्त करना नहीं, बल्कि अज्ञानता के पर्दे को हटाना है।
जीव शरीर, मन और अहंकार का आरोप आत्मा पर कर लेता है और यही संसार के भ्रम का कारण बनता है। ज्ञान प्राप्त होने पर यह भ्रम समाप्त हो जाता है। ज्ञानी व्यक्ति अनुभव करता है कि देखने वाला, देखने की शक्ति और देखने का विषय—इन सभी का मूल आधार एक ही ब्रह्म है।
संत ने कहा, "परमात्मा को किसी वस्तु की तरह देखने का प्रयास करना अज्ञानता का परिणाम है।" उन्होंने यह भी बताया कि "परमात्मा स्वयं केवल प्रकाश नहीं हैं, बल्कि समस्त प्रकाश को प्रकाशित करने वाले हैं।" इसके अलावा, "यहां हृदय से आशय केवल शरीर के अंग से नहीं, बल्कि निर्मल मन से है।"
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- परमात्मा को कैसे जाना जा सकता है?
- परमात्मा को निर्मल मन, सूक्ष्म विवेक और आत्मानुभूति से जाना जा सकता है, न कि इंद्रियों से।
- परमात्मा का स्वरूप क्या है?
- परमात्मा किसी सीमित रूप में नहीं हैं, बल्कि वे प्रत्येक जीव के हृदय में आत्मस्वरूप के रूप में सदैव विद्यमान हैं।
- संसार में भ्रम क्यों उत्पन्न होता है?
- जीव शरीर, मन और अहंकार का आरोप आत्मा पर पड़ने के कारण संसार में भ्रम पैदा होता है।
- ज्ञानी व्यक्ति परमात्मा को किस रूप में अनुभव करता है?
- ज्ञानी व्यक्ति अनुभव करता है कि देखने वाला, देखने की शक्ति और देखने का विषय एक ही ब्रह्म का हिस्सा हैं।
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