भूपेन हजारिका: असम की मिट्टी से निकली सुधाकंठ की आवाज़
महान गायक, संगीतकार और फिल्मकार भूपेन हजारिका ने भारतीय संगीत को नई पहचान दी
भूपेन हजारिका, जो 8 सितंबर 1926 को असम के तिनसुकिया में जन्मे, ने लगभग 1,000 गाने और 15 किताबें लिखीं, जिनमें सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता दी गई। उन्होंने असम की संस्कृति को अपनी आवाज़ के माध्यम से प्रस्तुत किया और हिंदी सिनेमा में भी संगीत दिया। उनकी रचनाएं आम आदमी और समाज के हितों से जुड़ी थीं।
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भूपेन हजारिका। 8 सितंबर 1926 को असम के तिनसुकिया में जन्मे भूपेन हजारिका ने बचपन से ही संगीत से गहरा जुड़ाव बनाया। उनकी आवाज़ में असम की संस्कृति और आम लोगों की जिंदगी की झलक साफ़ दिखाई देती थी। उन्होंने करीब 1 हजार गाने और 15 किताबें लिखीं, जिनमें सामाजिक मुद्दों की गूंज थी।
भूपेन हजारिका को प्यार से 'सुधाकंठ' कहा जाता था, जिसका अर्थ है अमृत जैसी आवाज वाला कलाकार। उनकी मां शांतिप्रिया ने उन्हें पारंपरिक असमिया संगीत से परिचित कराया था। भूपेन की आवाज़ में असम की मिट्टी और वहां के लोगों की जिंदगी की गहराई झलकती थी।
उन्होंने महज 12 साल की उम्र में दो फिल्मों के गाने लिखे थे और आगे चलकर करीब 1 हजार गाने और 15 किताबें लिखीं। उनके संगीत ने हिंदी सिनेमा में भी खास पहचान बनाई। उन्होंने 'रुदाली', 'साज', 'मिल गई मंजिल', 'मुझे', 'दरमियां' और 'गजगामिनी' जैसी फिल्मों में संगीत दिया।
शुरुआती पढ़ाई गुवाहाटी में करने के बाद उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान की पढ़ाई की और फिर अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अध्ययन किया। विदेश में रहने के बावजूद उनकी जड़ें अपनी मिट्टी से कभी नहीं टूटीं।
उनकी रचनाओं में आम आदमी, सामाजिक बराबरी और इंसानियत जैसे मुद्दे लगातार दिखाई देते रहे। भूपेन हजारिका की आवाज़ में ऐसी गहराई और प्रभाव था, जिसने उन्हें बाकी कलाकारों से अलग पहचान दी। असम के प्रसिद्ध कवि आनंद चंद्र बरुआ ने उन्हें 'सुधाकंठ' की उपाधि दी थी।
उनके गीतों में सिर्फ सुर और संगीत नहीं था, बल्कि समाज की आवाज़ भी सुनाई देती थी। उनका संगीत गरीब, मजदूर, वंचित और आम इंसान की जिंदगी से जुड़ा था। वह अपने गीतों के जरिए लोगों को सोचने और सवाल करने के लिए प्रेरित करते थे।
भूपेन हजारिका के लिए संगीत केवल कमाई का जरिया नहीं था, बल्कि अपनी कला को समाज के प्रति जिम्मेदारी मानते थे। इसी वजह से बिना अनुमति उनके गीतों को रीमिक्स किए जाने पर भी वह नाराज होते थे। उनका मानना था कि उनके गीतों में मौजूद सामाजिक संदेश को बदलने या कमजोर करने का अधिकार किसी को नहीं है।
वे बेहद कोमल दिल वाले इंसान थे। बिहू उत्सव के दौरान एक कार्यक्रम के बाद उन्होंने एक स्थानीय ढोलकिए को मंच के नीचे सोते हुए देखा। वह कलाकार लंबे समय तक प्रस्तुति देने के बाद थककर वहीं सो गया था। भूपेन दा की नजर जब उस पर पड़ी तो उन्होंने अपनी कार रुकवाई और उसे खुद उसके घर तक पहुंचाया। उनका मानना था कि कलाकार छोटा या बड़ा नहीं होता, जो व्यक्ति कला के लिए मेहनत करता है, वह सम्मान का हकदार है।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक भूपेन हजारिका ने मशहूर एक्ट्रेस कल्पना लाजमी से शादी की थी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- भूपेन हजारिका की संगीत शैली में क्या खास था?
- उनके गीतों में सामाजिक मुद्दे और आम आदमी की जिंदगी की झलक थी, जो उन्हें अन्य कलाकारों से अलग बनाता था।
- भूपेन हजारिका ने हिंदी सिनेमा में कौन-कौन सी फिल्में संगीतबद्ध किया?
- उन्होंने 'रुदाली', 'साज', 'मिल गई मंजिल', 'मुझे', 'दरमियां' और 'गजगामिनी' जैसी फिल्मों में संगीत दिया।
- भूपेन हजारिका को 'सुधाकंठ' क्यों कहा जाता था?
- असम के कवि आनंद चंद्र बरुआ ने उनकी अमृत जैसी मीठी आवाज़ और गहराई के कारण यह उपाधि दी थी।
- भूपेन हजारिका का संगीत समाज के प्रति उनका नजरिया क्या था?
- वे संगीत को सिर्फ कमाई नहीं मानते थे, बल्कि इसे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते थे।
- भूपेन हजारिका की व्यक्तिगत जीवन से जुड़ा एक अनछुआ पहलू क्या है?
- उन्होंने मशहूर एक्ट्रेस कल्पना लाजमी से शादी की थी।
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