सीकर के विजय गणेश मंदिर की 250 साल पुरानी रहस्यमयी कहानी
तीन रियासतों से गुजरी गणेश प्रतिमा ने युद्ध में दिखाई चमत्कारी शक्ति
सीकर के विजय गणेश मंदिर में स्थापित गणेशजी की मूर्ति तीन रियासतों—पाटोदा, कासली और सीकर—का 250 साल पुराना सफर तय कर आस्था का केंद्र बनी है। इसे युद्ध और चमत्कारों से जुड़ा माना जाता है और गणेश चतुर्थी पर यहां विशेष आयोजन होते हैं।
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सीकर। सीकर के फतेहपुरी गेट स्थित विजय गणेश मंदिर में स्थापित गणेशजी की मूर्ति तीन रियासतों का सफर तय कर 250 सालों से आस्था का केंद्र बनी हुई है। इतिहासकार महावीर पुरोहित के अनुसार, इस मूर्ति से जुड़ी कहानी में युद्ध और चमत्कार दोनों शामिल हैं।
यह मूर्ति पहले पाटोदा, फिर कासली और अंततः सीकर पहुंची। इसे तीन रियासतों की यात्रा करने वाली गणेश प्रतिमा कहा जाता है। वर्ष 1840 में सीकर में राव देवी सिंह का शासन था, जबकि कासली पर पूरणमल का दबदबा था। पूरणमल रोजाना नानी दरवाजे पर आकर भाला मारते हुए राव देवी सिंह को युद्ध की चुनौती देता था, जिससे दोनों रियासतों के बीच टकराव बढ़ गया।
राव देवी सिंह ने पहले बातचीत से मामला सुलझाने की कोशिश की, लेकिन जब समाधान नहीं निकला तो उन्होंने पूरणमल के मौसेरे भाई और अलवर नरेश प्रताप सिंह को मध्यस्थता के लिए कहा। मध्यस्थता विफल होने पर सीकर की सेना ने कासली पर हमला कर दिया। युद्ध में कासली पर दागे गए तोप के गोले मूर्ति के कारण अपना असर नहीं कर पाए।
युद्धभूमि में मौजूद लोगों के लिए यह घटना चमत्कार से कम नहीं थी। माना जाता था कि कासली में स्थापित विघ्न हरण गणेशजी की मूर्ति हर संकट और हमले से रक्षा करती है। पंडितों की सलाह पर राव देवी सिंह ने रणभूमि में घुटनों के बल बैठकर गणेशजी की स्तुति की और विजय की प्रार्थना की। इसके बाद युद्ध हुआ जिसमें सीकर की सेना को जीत मिली और कासली रियासत सीकर में शामिल हो गई।
युद्ध में विजय के बाद गणेशजी की वही प्रतिमा सीकर लाई गई और फतेहपुरी गेट के पास स्थापित की गई, तब से इन्हें विजय गणेश के नाम से जाना जाता है। इस मूर्ति की सबसे अनोखी बात यह है कि मिट्टी की होने के बावजूद यह पानी में नहीं गलती। बरसात के दौरान मंदिर में पानी भरने पर मूर्ति कई बार पूरी तरह पानी में डूबी, लेकिन उसे कोई नुकसान नहीं हुआ। अब मूर्ति को पानी से सुरक्षित रखने के इंतजाम किए गए हैं।
विजय गणेशजी का सफर कासली से भी पहले का बताया जाता है। मान्यता है कि यह प्रतिमा पहले पाटोदा में थी, जिसे पुराने समय में पाटकद्वव के नाम से जाना जाता था। वहां भी मूर्ति से जुड़े कई चमत्कारों की बातें सामने आती हैं। इसके बाद यह मूर्ति कासली पहुंची और वहां विघ्न हरण गणेश के रूप में पूजी गई। पाटोदा से मूर्ति कब और कहां से आई, इसका प्रमाणित इतिहास उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसे 250 साल से भी पुराना माना जाता है।
गणेश चतुर्थी के मौके पर विजय गणेश मंदिर में आस्था का बड़ा आयोजन होगा। 13 सितंबर को सिंजारा पर्व पर शाम 5:15 बजे भगवान गणेशजी को मेहंदी लगाई जाएगी, जो भक्तों में प्रसाद के रूप में बांटी जाएगी। अगले दिन 14 सितंबर को महाआरती, शोभायात्रा और रात में जागरण का आयोजन होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- गणेशजी की मूर्ति को 'विजय गणेश' क्यों कहा जाता है?
- यह मूर्ति सीकर की सेना की कासली पर जीत के बाद लायी गई थी, इसलिए इसे विजय गणेश के नाम से जाना जाता है।
- क्या मूर्ति से जुड़ी कोई खास चमत्कारिक घटना है?
- युद्ध में मूर्ति को तोप के गोले का कोई असर नहीं हुआ, जिसे चमत्कार माना जाता है।
- मूर्ति का सीकर पहुंचने से पहले का इतिहास क्या है?
- मूर्ति पहले पाटोदा नामक स्थान की थी जिसे पाटकद्वव भी कहा जाता था, लेकिन इस अवधि का प्रमाणित इतिहास उपलब्ध नहीं है।
- मूर्ति की सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम किए गए हैं?
- मूर्ति को पानी से सुरक्षित रखने के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं ताकि बारिश में कोई नुकसान न हो।
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