शव न मिलने पर कुश घास से पुतला बनाकर अंतिम संस्कार
नेपाल में बाढ़ में लापता लोगों के लिए पशुपति आर्यघाट में पुत्तल दाह की प्राचीन परंपरा अपनाई जा रही है
नेपाल में भीषण बाढ़ के कारण कई लोगों के शव नहीं मिलने की स्थिति में, परिवार जन पशुपति आर्यघाट पर कुश घास से प्रतीकात्मक पुतला बनाकर अंतिम संस्कार कर रहे हैं। यह विधि गरुड़ पुराण में वर्णित है और मृतक की आत्मा की मुक्ति के लिए जरूरी मानी जाती है, जिससे परिवार का सूतक समाप्त होता है।
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नेपाल में भीषण बाढ़ के कारण कई लोगों के शव नहीं मिले हैं। ऐसे में पशुपति आर्यघाट पर परिवार कुश घास से प्रतीकात्मक पुतला बनाकर अंतिम संस्कार कर रहे हैं। यह विधि हिंदू धर्म के गरुड़ पुराण में वर्णित है और मृतक की आत्मा की मुक्ति के लिए जरूरी मानी जाती है।
हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार न होने तक परिवार पर सूतक लगता है, जिससे कोई धार्मिक या शुभ कार्य नहीं हो सकता। जब शव न मिले तो परिवार इस संकट से जूझता है कि अंतिम संस्कार कैसे होगा। इस समस्या के समाधान के लिए पशुपति आर्यघाट में पुत्तल दाह की प्राचीन पौराणिक परंपरा अपनाई जा रही है।
गरुड़ पुराण के प्रेतकल्प में स्पष्ट है कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु विदेश, बीहड़ जंगल, बाढ़ या दुर्घटना में हो और शव न मिले तो कुश की पवित्र घास से प्रतीकात्मक पुतला बनाकर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ उसे अग्नि दी जाती है। इस प्रक्रिया को पुत्तल दाह या तृणपिंड दाह कहा जाता है।
पुत्तल दाह के पूरा होते ही दशगात्र, पिंडदान और तेरहवीं की धार्मिक क्रियाएं शुरू हो जाती हैं। तेरहवीं पूरी होने पर घर की शुद्धि हो जाती है और सूतक समाप्त माना जाता है।
सनातन परंपरा में बिना देह के मुक्ति का उदाहरण रामायण काल से भी मिलता है। राजा सगर के 60 हजार पुत्र महर्षि कपिल के श्राप से भस्म हो गए थे, लेकिन गंगाजल के स्पर्श से उनकी आत्मा को मोक्ष मिला था। इसी कारण शरीर न मिलने पर कुश के पुतले की भस्म को गंगाजल में विसर्जित कर मोक्ष की प्रार्थना की जाती है।
नेपाल में आई बाढ़ में कई लोग बह गए और हफ्तों बीत जाने के बाद भी उनके शव नहीं मिले। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बिना अंतिम संस्कार मृतक की आत्मा भटकती रहती है और परिवार का सूतक खत्म नहीं होता। इस धार्मिक संकट का समाधान निकालने के लिए काठमांडू के पशुपति आर्यघाट पर पीड़ित परिवार गरुड़ पुराण के विधान को अपनाकर अपने परिजनों को अंतिम विदाई दे रहे हैं।
बाढ़ के छह दिन बाद भी सुरंग में फंसे 40 लोग हैं, जिनमें एक इंजीनियर की पत्नी ने सरकार से सवाल किया है कि उनकी जान की कीमत क्या है।
इस विषय पर नवभारत टाइम्स के प्रिंसिपल डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर विवेक सिंह ने बताया कि वे दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व के वैश्विक तनावों पर गहराई से कवरेज करते हैं और इस पर भारत पर असर की जानकारी देते हैं। उनका पत्रकारिता का 12 वर्षों का अनुभव है।
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