कांग्रेस को झुंझुनूं नगर परिषद चुनाव में बगावत से चुनौती
2019 में 34 सीटें जीतने वाली कांग्रेस को इस बार अपने ही बागी प्रत्याशियों से मुकाबला
झुंझुनूं नगर परिषद चुनाव 2026 में कांग्रेस को अपने ही बागी नेताओं और कार्यकर्ताओं की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, जिन्होंने टिकट न मिलने पर निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया है। इस स्थिति में भाजपा को फायदा मिलने की संभावना जताई जा रही है, जबकि निर्दलीय उम्मीदवार भी चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।
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झुंझुनूं। झुंझुनूं नगर परिषद चुनाव 2026 में कांग्रेस को अपने ही नेताओं और कार्यकर्ताओं की बगावत से जूझना पड़ रहा है। टिकट बंटवारे के बाद कई नेता पार्टी छोड़कर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं, जिससे कांग्रेस के लिए पिछला प्रदर्शन दोहराना मुश्किल हो गया है।
वर्ष 2019 में कांग्रेस ने 60 में से 34 वार्ड जीतकर नगर परिषद में साफ बहुमत हासिल किया था, जबकि भाजपा को केवल 10 सीटें मिली थीं। उस चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में माहौल और संगठन की मजबूती साफ दिखी थी। इस बार राजनीतिक हालात बदल गए हैं और कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि उसके अपने बागी नेता हैं।
टिकट बंटवारे के बाद कई नेताओं और कार्यकर्ताओं ने पार्टी से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया है। कई वार्डों में मुकाबला कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी और बागी उम्मीदवारों के बीच हो रहा है। इससे कांग्रेस के लिए 2019 का प्रदर्शन दोहराना आसान नहीं माना जा रहा।
नगर परिषद में लगातार दूसरी बार अपना बोर्ड बनाना सांसद बृजेंद्र ओला के लिए भी प्रतिष्ठा का सवाल है। पिछले कार्यकाल के पांच निवर्तमान पार्षद मकबूल हुसैन, इशाक फूलका, जब्बार फूलका, नाजिमा बानो और हीना बानो इस बार भाजपा के साथ हैं। इन नेताओं के पार्टी बदलने से कई वार्डों का राजनीतिक गणित बदल गया है।
कांग्रेस के लिए कई वार्ड महत्वपूर्ण हैं, जिनमें 7, 37, 38, 41, 42, 46, 51, 52, 53 और 57 शामिल हैं। इन वार्डों में जीत कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से अहम मानी जा रही है। वार्ड 37 में कांग्रेस के बागी रियाज खान ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। वहीं, वार्ड 38 में जिला प्रवक्ता शहबाज फारूकी और कोमल निर्वाण के चुनाव मैदान में उतरने से कांग्रेस की राह और कठिन हो गई है। इन वार्डों के नतीजों से पता चलेगा कि कांग्रेस अपनी पुरानी पकड़ बचा पाती है या नहीं।
भाजपा इस चुनाव को 2019 की हार से वापसी का मौका मान रही है। इस बार भाजपा ने टिकट बांटने से लेकर चुनाव प्रचार तक पूरी ताकत लगाई है और उन वार्डों में वापसी की कोशिश कर रही है जहां उसे पिछली बार हार मिली थी। कांग्रेस में हुई बगावत का भाजपा को फायदा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
वर्ष 2019 के चुनाव में 16 निर्दलीय उम्मीदवार जीतकर पार्षद बने थे। इससे पता चलता है कि झुंझुनूं की राजनीति में स्थानीय चेहरों और उनके जनसमर्थन की बड़ी भूमिका है। इस बार भी बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में हैं, जो भाजपा और कांग्रेस दोनों का चुनावी गणित बिगाड़ सकते हैं। अगर किसी दल को साफ बहुमत नहीं मिलता है, तो निर्दलीय पार्षद बोर्ड बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
सामाजिक समीकरण भी इस चुनाव में महत्वपूर्ण हैं। वर्ष 2019 में 25 से ज्यादा मुस्लिम पार्षद चुने गए थे, जिनमें ज्यादातर कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवार थे। शहर के कई वार्डों में मुस्लिम मतदाता चुनाव का नतीजा तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इस बार भी इन वार्डों पर सभी राजनीतिक दलों की खास नजर है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- भाजपा इस चुनाव को कैसे देख रही है?
- भाजपा इस चुनाव को 2019 की हार से वापसी का मौका मान रही है और टीम ने पूरा जोर लगा रखा है।
- निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका क्या है?
- निर्दलीय उम्मीदवार स्थानीय जनसमर्थन के कारण चुनावी गणित बिगाड़ सकते हैं और बहुमत न मिलने पर बोर्ड बनाने में अहम हो सकते हैं।
- कांग्रेस के लिए कौन से वार्ड महत्वपूर्ण हैं?
- कांग्रेस के लिए वार्ड 7, 37, 38, 41, 42, 46, 51, 52, 53 और 57 को राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।
- सामाजिक समीकरणों का चुनाव में क्या महत्व है?
- शहर के कई वार्डों में मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं, जहां 2019 में 25 से ज्यादा मुस्लिम पार्षद चुने गए थे।
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