भारत बना यूरोप का प्रमुख डीजल सप्लायर, मांग रूस में भी बढ़ी
अगस्त में बाब-अल-मंदेब से यूरोप को भेजे गए डीजल में भारत की 60 प्रतिशत हिस्सेदारी
भारत की रिफाइनिंग क्षमता घरेलू मांग से अधिक है और वह यूरोप को डीजल की आपूर्ति में प्रमुख स्रोत बन गया है, अगस्त में Bab-al-Mandeb से यूरोप जाने वाले डीजल का लगभग 60 प्रतिशत भारत से आया। रूस की रिफाइनरी हमलों और निर्यात में गिरावट के कारण यूरोप की डीजल आपूर्ति सीमित हो गई है, जिससे भारत की भूमिका बढ़ गई है।
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बिजनेस डेस्क। भारत की स्थापित रिफाइनिंग क्षमता सालाना 25.81 करोड़ टन है, जो घरेलू ईंधन मांग से अधिक है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने 6.15 करोड़ टन पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात किया, जिससे वह दुनिया के प्रमुख रिफाइन्ड पेट्रोलियम उत्पाद निर्यातकों में शामिल हो गया है।
अगस्त में बाब-अल-मंदेब से यूरोप की ओर जाने वाले डीजल में करीब 60 प्रतिशत हिस्सेदारी भारत की रही। ऊर्जा और माल ढुलाई क्षेत्र के तत्काल आधार पर आंकड़े उपलब्ध कराने वाली कंपनी वॉर्टेक्सा के अनुसार, रोजाना करीब 2 लाख बैरल डीजल इस मार्ग से यूरोप भेजा गया। यह मात्रा एक साल पहले के स्तर के करीब है, जबकि मार्च और अप्रैल में इस समुद्री मार्ग से डीजल की आवाजाही लगभग ठप हो गई थी।
भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा तेल रिफाइनर है। उसकी रिफाइनरी यूनिट्स अब यूरोप की डीजल सप्लाई में बड़ी भूमिका निभा रही हैं। हालांकि, कच्चे तेल की उपलब्धता भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। वॉर्टेक्सा के अनुसार, अगस्त में भारत में कच्चे तेल और कन्डनसेट की आवक लगातार दूसरे महीने घटकर करीब 38 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई, जबकि एक साल पहले यह करीब 48 लाख बैरल प्रतिदिन थी।
अगर कच्चे तेल की सप्लाई पर दबाव बना रहता है तो भारतीय रिफाइनरी यूनिट्स के पास निर्यात के लिए उपलब्ध अतिरिक्त डीजल की मात्रा प्रभावित हो सकती है।
रूस से डीजल की सप्लाई में भारी गिरावट आई है। अगस्त के पहले 25 दिन में रूस का समुद्री डीजल और गैसऑयल निर्यात औसतन करीब 1.5 लाख बैरल प्रतिदिन रहा, जो एक साल पहले की तुलना में करीब 6.1 लाख बैरल प्रतिदिन कम है और पांच साल के औसत से 81 प्रतिशत नीचे है।
यूक्रेन के ड्रोन हमलों ने रूस की रिफाइनरी इकाइयों और निर्यात ढांचे को लगातार प्रभावित किया है। जुलाई और अगस्त में रूस की रिफाइनरी पर 32 हमले दर्ज किए गए। पर्म रिफाइनरी पर हुए हमले के बाद उसकी परिचालन क्षमता बुरी तरह प्रभावित हुई है।
रूस के डीजल निर्यात में ब्लैक सी क्षेत्र की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जहां से पिछले साल कुल निर्यात का करीब 44 प्रतिशत यानी 3.8 लाख बैरल प्रतिदिन हुआ करता था। लेकिन बंदरगाहों और रिफाइनरी में व्यवधान के कारण यहां से आपूर्ति घट गई है। मई में हुए हमले के बाद से तुआप्से बंदरगाह से किसी डीजल खेप का निर्यात नहीं हुआ।
यूरोप को रूस की कमी की भरपाई में अमेरिका से भी मदद मिली है, लेकिन अब वहां से आने वाली आपूर्ति भी कमजोर पड़ने लगी है। अगस्त में यूरोप के बाहर से आने वाले समुद्री डीजल आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब आधी रही।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से भी साफ पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति में फिलहाल ज्यादा राहत नहीं मिल रही है। अगस्त के पहले 27 दिन में एमआर2 या उससे बड़े टैंकर से साफ पेट्रोलियम उत्पादों की केवल 37 आवाजाही दर्ज की गई, जबकि जुलाई में यह संख्या 55 और जून में 69 थी। ओमान के तट के पास जहाज से जहाज में तेल स्थानांतरण जारी है, लेकिन इनमें ज्यादातर कच्चा तेल शामिल है। साफ पेट्रोलियम उत्पादों का यह कारोबार जून की तुलना में काफी घट गया है।
इस स्थिति में यूरोप की डीजल आपूर्ति श्रृंखला पहले के मुकाबले अधिक सीमित स्रोतों पर निर्भर रह गई है। रूस की आपूर्ति कमजोर बनी हुई है, अमेरिका से आने वाली खेप घट रही है और होर्मुज मार्ग से अतिरिक्त आपूर्ति सीमित है। ऐसे में भारत यूरोप के लिए डीजल की आपूर्ति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- भारत की रिफाइनिंग क्षमता घरेलू मांग से कैसे प्रभावित है?
- भारत की रिफाइनिंग क्षमता घरेलू मांग से अधिक होने के कारण अतिरिक्त उत्पाद निर्यात किया जाता है।
- रूस की डीजल सप्लाई में गिरावट का कारण क्या है?
- यूक्रेन के ड्रोन हमलों और रिफाइनरी इकाइयों पर हमले के कारण रूस की डीजल सप्लाई प्रभावित हुई है।
- अमेरिका यूरोप की डीजल आपूर्ति में कैसे मदद कर रहा है?
- अगस्त में अमेरिका समुद्री डीजल आयात में करीब आधा हिस्सा देता रहा है, हालाँकि आपूर्ति कमजोर पड़ रही है।
- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति की स्थिति क्या है?
- यहां से साफ पेट्रोलियम उत्पादों की आवाजाही जून की तुलना में काफी घट गई है, जबकि जहाज से जहाज तेल स्थानांतरण जारी है।
- भारत की रिफाइनरी यूनिट्स को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?
- कच्चे तेल और कन्डनसेट की घटती आवक भारत के निर्यात क्षमता को प्रभावित कर सकती है।
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