डूंगरपुर के ओबरी में 343 साल पुरानी ठाकुरजी की मूर्ति
विक्रम संवत 1739 में पुनः स्थापित हुई मूर्ति आज भी आस्था का केंद्र
डूंगरपुर जिले के ओबरी कस्बे में ठाकुरजी मंदिर 800 साल पुरानी धार्मिक विरासत का प्रतीक है, जहाँ ठाकुरजी की मूर्ति विक्रम संवत 1739 में पुनः स्थापित की गई थी। यह मंदिर सांस्कृतिक धरोहर के रूप में जाना जाता है और यहाँ की धार्मिक परंपराएँ आज भी निभाई जाती हैं, जैसे शादी के अवसर पर दूल्हे का ठाकुरजी के दर्शन करना।
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डूंगरपुर। डूंगरपुर जिले के ओबरी कस्बे में ठाकुरजी मंदिर करीब 800 साल पुरानी धार्मिक विरासत का प्रतीक है। यहां विराजमान ठाकुरजी की मूर्ति को विक्रम संवत 1739 में स्थानीय वरिष्ठों और वैष्णव परिवार ने मिलकर पुनः स्थापित किया था। मंदिर में आज भी उस समय का शिलालेख मौजूद है जो मूर्ति की पुनर्स्थापना का प्रमाण है।
इतिहासकारों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार करीब 800 साल पहले गुजरात के कडाणा से परमार वंश के लोग गलियाकोट होते हुए ओबरी पहुंचे थे। उन्होंने यहां वडीखंड माता और ठाकुरजी की पहली मूर्ति स्थापित की थी। समय के साथ यह पहली मूर्ति खंडित हो गई।
स्थानीय मान्यता है कि एक वैष्णव पुजारी को सपने में आदेश मिला कि उमराई माता मंदिर के पीछे खेतों में ठाकुरजी की मूर्ति दबी हुई है। इसके बाद मूर्ति को खोजकर पुनः स्थापित किया गया। तब से यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी जाना जाता है।
मंदिर के सामने भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ देव की प्रतिमा भी स्थापित है। ठाकुरजी की प्रतिमा के नीचे चार मुख्य गण विश्वक्सेन, गरुड़, शेषनाग और लक्ष्मी विराजमान हैं। भगवान के चारों हाथों में शंख, चक्र, पद्म और गदा हैं।
करीब सात साल पहले एकादशी व्रत करने वाली महिलाओं ने मंदिर में पीतल के नन्हे लड्डू गोपाल भी स्थापित किए थे। ओबरी में आज भी ठाकुरजी से जुड़ी वर्षों पुरानी परंपरा निभाई जा रही है।
कस्बे में किसी परिवार में शादी होने पर बिलोना यानी बारात रवाना होने के समय दूल्हा घोड़ी से उतरकर पहले उमराई माता और फिर ओबरी सरकार ठाकुरजी के दर्शन करता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि ठाकुरजी का आशीर्वाद लेने से नवविवाहित दंपती का जीवन सुखमय और मंगलमय रहता है।
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