भारत में मतदाता सूची से 11.83 करोड़ नाम हटाए गए
विशेष गहन संशोधन के बाद मतदाता संख्या में बड़ी गिरावट, राजनीतिक बहस तेज
भारत में विशेष गहन संशोधन प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से 11.83 करोड़ नाम हटाए गए हैं, जो कुल मतदाताओं का 12.1 प्रतिशत है। इस प्रक्रिया के तहत विभिन्न राज्यों में मतदाताओं के नाम में गिरावट और मतदान दर में परिवर्तन देखा गया है, साथ ही कानूनी विवाद और राजनीतिक बहस भी जारी है।
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भारत में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) के दौरान करीब 11.83 करोड़ नाम हटाए गए हैं। यह संख्या कुल मतदाताओं का 12.1 प्रतिशत है, जिससे देश में राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। सरकार के आलोचक इसे वैध मतदाताओं की अनदेखी मानते हैं, जबकि समर्थक केवल मृत और फर्जी नाम हटाने का दावा करते हैं।
एसआईआर की प्रक्रिया के तहत बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी में चुनाव हो चुके हैं, जहां अंतिम सूची में मतदाताओं की संख्या में 8.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात समेत आठ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, जहां नामों में 10.7 प्रतिशत की कमी देखी गई। वहीं, 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जहां केवल ड्राफ्ट रोल जारी हुआ है, वहां नाम हटाने की दर 17 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
आंकड़ों से पता चलता है कि शुरुआत में नाम हटने की दर अधिक होती है, लेकिन दावे और आपत्तियां दर्ज होने के बाद कई नाम वापस जुड़ जाते हैं। फाइनल लिस्ट आने के बाद कुल 30.36 करोड़ मतदाता बचे हैं।
संशोधन के बाद जहां कुल नाम कम हुए हैं, वहां मतदान प्रतिशत में वृद्धि देखी गई है, हालांकि कुछ विधानसभा क्षेत्रों में वास्तविक मतदान संख्या में गिरावट आई है। कई जगह कागजी औपचारिकताओं के कारण नागरिकों को भी दिक्कतें हुई हैं। उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल में लगभग 27 लाख मतदाता सूची से हटाए जाने के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।
इस प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस जारी है। सरकार के आलोचक कहते हैं कि लाखों वैध मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं, जबकि सरकार के समर्थक दावा करते हैं कि केवल मृत, स्थानांतरित और फर्जी मतदाताओं को ही सूची से हटाया गया है।
इस विषय पर राजनीतिक विश्लेषक हिमांशु शेखर झा का कहना है कि इस प्रक्रिया ने मतदाता सूची को साफ करने में मदद की है, लेकिन साथ ही कुछ असुविधाएं भी आई हैं। उन्होंने बताया कि यह बहस लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है और आगे सुधार की गुंजाइश बनी रहेगी।
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