कोटा नगर निगम चुनाव में मंत्री और नेता की प्रतिष्ठा दांव पर
भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर, ओबीसी वोट बैंक का विशेष प्रभाव
कोटा नगर निगम चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के प्रमुख नेताओं सहित मंत्री और पूर्व मंत्रियों की प्रतिष्ठा दांव पर है। चुनाव में 70 वार्ड शामिल हैं, जहां जातिगत समीकरण और राजनीतिक रणनीतियां निर्णायक भूमिका निभा रही हैं। भाजपा संगठन स्तर पर सक्रिय है, जबकि कांग्रेस को पार्षद प्रत्याशियों को समर्थन में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
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कोटा। कोटा नगर निगम चुनाव में भाजपा के ओम बिरला, हीरालाल नागर और मदन दिलावर तथा कांग्रेस के पूर्व मंत्री शांति धारीवाल और प्रहलाद गुंजल की प्रतिष्ठा दांव पर है। चुनाव में 70 वार्ड शामिल हैं, जहां जातिगत समीकरण और नेताओं की रणनीति निर्णायक भूमिका निभा रही है।
कोटा नगर निगम में कुल 70 वार्ड हैं, जिनमें ओबीसी वर्ग का 21 प्रतिशत वार्डों पर सीधा प्रभाव है। इसमें जाट, माली, गुर्जर, धाकड़ और कुमावत जातियां शामिल हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों को इन जातियों से लगभग बराबर समर्थन मिलता है। इसके अलावा, मुस्लिम, सिंधी और क्रिश्चियन समाज के वोटर भी कुछ वार्डों में प्रभाव रखते हैं। हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण भी राजनीतिक दलों को लाभ पहुंचाता है।
भाजपा में मंत्री हीरालाल नागर और मदन दिलावर सक्रिय हैं, साथ ही जिले के अन्य मंत्री और विधायक भी ओम बिरला के समर्थन में टिकट वितरण में लगे हैं। कांग्रेस में शांति धारीवाल ने चुनाव की कमान संभाली है, जबकि प्रहलाद गुंजल और उनके कार्यकर्ता ओबीसी वोट बैंक पर अच्छी पकड़ बनाए हुए हैं। हाल ही में प्रियंका गांधी ने भी प्रहलाद गुंजल से दिल्ली में मुलाकात की।
कोटा में एक निगम पर चुनाव होने से कांग्रेस के लिए चुनौतियां बढ़ी हैं क्योंकि शहरी वोटर भाजपा के पक्ष में माने जाते हैं। कांग्रेस सत्ता में रहते हुए परिसीमन में पक्षपात के आरोपों का सामना कर रही है। कांग्रेस के पास प्रभावशाली नेताओं की कमी है, जबकि भाजपा के पूर्व मेयर सुशीला राजपुरोहित, महासचिव श्याम सिंह हाडला और वरिष्ठ नेता सुरेंद्र सिंह शेखावत जैसे नेता पूरी ताकत के साथ मैदान में हैं।
जातिगत समीकरणों में पुष्करणा ब्राह्मण और वैश्य वर्ग की आबादी अधिक है, जो चुनाव को सीधे प्रभावित कर सकती है। जाट, कुम्हार, सुथार और बिश्नोई समाज भी ओबीसी वोट बैंक का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। कुछ वार्डों में मुस्लिम और एससी-एसटी वर्ग का भी अच्छा वोट बैंक है।
अजमेर, भीलवाड़ा और बीकानेर के निगम चुनावों में भी भाजपा मजबूत स्थिति में है, हालांकि मुकाबला एकतरफा नहीं है। अजमेर में भाजपा के वासुदेव देवनानी और दो बार मेयर रहे धर्मेंद्र गहलोत के बीच अनबन खुलकर सामने आई है। गहलोत ने अपनी पत्नी को निर्दलीय उम्मीदवार बनाया है, जबकि कांग्रेस ने इस वार्ड से कोई प्रत्याशी नहीं उतारा है। भीलवाड़ा में पूर्व मंत्री रामलाल जाट और नेता धीरज गुर्जर चुनाव से दूरी बनाए हुए हैं।
कोटा में भाजपा संगठन स्तर पर प्रत्याशियों के समर्थन में जुटा है, जबकि कांग्रेस में पार्षद प्रत्याशियों को संगठनात्मक समर्थन नहीं मिल रहा है। कांग्रेस को भाजपा सरकार और पुराने भाजपा बोर्ड की एंटी इनकमबेंसी का लाभ मिल सकता है। यूजीसी बिल का मुद्दा भी कुछ वार्डों में असर डाल सकता है।
पार्षदों की बजाय इस चुनाव को ओम बिरला, शांति धारीवाल और प्रहलाद गुंजल के बीच सीधी टक्कर के रूप में देखा जा रहा है। मंत्री भागीरथ चौधरी और पूर्व मंत्री अनीता भदेल भी रणनीतिक साझेदारी निभा रहे हैं। कांग्रेस की बागडोर जिला अध्यक्ष राजकुमार जयपाल, प्रदेश सचिव रूबी खान, डेयरी चेयरमैन रामचंद्र चौधरी और गोपाल बाहेती जैसे नेता संभाल रहे हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- कोटा नगर निगम चुनाव में किन प्रमुख नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर है?
- ओम बिरला, हीरालाल नागर, मदन दिलावर, शांति धारीवाल और प्रहलाद गुंजल की प्रतिष्ठा चुनाव में दांव पर है।
- जातिगत समीकरण कोटा चुनाव में कैसे प्रभावित करते हैं?
- जाट, माली, गुर्जर, धाकड़, कुमावत, ब्राह्मण, वैश्य, मुस्लिम, सिंधी, क्रिश्चियन और एससी-एसटी जैसे विभिन्न जाति समूह चुनाव परिणाम को प्रभावित करते हैं।
- अजमेर और भीलवाड़ा निगम चुनावों की क्या खास बातें हैं?
- अजमेर में भाजपा के भीतर अंदरूनी लड़ाई है और कांग्रेस ने कुछ वार्डों में प्रत्याशी नहीं उतारे, जबकि भीलवाड़ा में कुछ प्रमुख नेता चुनाव से पीछे हैं।
- कोटा नगर निगम चुनाव में कांग्रेस किन प्रमुख नेताओं के नेतृत्व में है?
- शांति धारीवाल ने चुनाव की कमान संभाली है, और जिला अध्यक्ष राजकुमार जयपाल, प्रदेश सचिव रूबी खान समेत अन्य नेता चुनाव को संभाल रहे हैं।
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