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भीतर विराजती मां शक्ति
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भीतर विराजती मां शक्ति

मनुष्य जीवन भर प्रकाश की तलाश बाहर करता है, जबकि उसकी सबसे गहरी ज्योति भीतर ही स्थित होती है। मेरे लिए इस आत्मदीप का स्रोत शक्ति उपासना है। मां शक्ति की आराधना केवल वरदान पाने या संकट दूर करने की साधना नहीं, बल्कि अपने भीतर सोई हुई चेतना, साहस, करुणा, विवेक और संकल्प को जगाने का मार्ग है।
जब साधक मां के सामने अहंकार छोड़कर बैठता है, तब धीरे धीरे उसे अपने भीतर के भय, क्रोध, मोह और अस्थिरता का बोध होने लगता है। यही बोध साधना की पहली सीढ़ी है। जप मन को एकाग्र करता है, ध्यान भीतर की आवाज सुनना सिखाता है और समर्पण यह अनुभव कराता है कि शक्ति कहीं बाहर नहीं, हमारे भीतर भी उसी चेतना के रूप में प्रवाहित है।

आत्मदीप बनने का अर्थ संसार से विरक्त होना नहीं, बल्कि संसार के बीच रहते हुए भी भीतर स्थिर रहना है। शक्ति साधना हमें केवल मजबूत नहीं बनाती, वह हमें संतुलित भी करती है। जिस दिन साधक अपने भीतर मां की उपस्थिति को अनुभव करने लगे, उसी दिन अंधकार कम होने लगता है। तब जीवन केवल संघर्ष नहीं रहता, साधना बन जाता है। और साधक स्वयं एक दीप बनकर अपने आसपास भी प्रकाश बांटने लगता है।

मनुष्य जीवन भर प्रकाश की तलाश बाहर करता है, जबकि उसकी सबसे गहरी ज्योति भीतर ही स्थित होती है। मेरे लिए इस आत्मदीप का स्रोत शक्ति उपासना है। मां शक्ति की आराधना केवल वरदान पाने या संकट दूर करने की साधना नहीं, बल्कि अपने भीतर सोई हुई चेतना, साहस, करुणा, विवेक और संकल्प को जगाने का मार्ग है। जब साधक मां के सामने अहंकार छोड़कर बैठता है, तब धीरे धीरे उसे अपने भीतर के भय, क्रोध, मोह और अस्थिरता का बोध होने लगता है। यही बोध साधना की पहली सीढ़ी है। जप मन को एकाग्र करता है, ध्यान भीतर की आवाज सुनना सिखाता है और समर्पण यह अनुभव कराता है कि शक्ति कहीं बाहर नहीं, हमारे भीतर भी उसी चेतना के रूप में प्रवाहित है। आत्मदीप बनने का अर्थ संसार से विरक्त होना नहीं, बल्कि संसार के बीच रहते हुए भी भीतर स्थिर रहना है। शक्ति साधना हमें केवल मजबूत नहीं बनाती, वह हमें संतुलित भी करती है। जिस दिन साधक अपने भीतर मां की उपस्थिति को अनुभव करने लगे, उसी दिन अंधकार कम होने लगता है। तब जीवन केवल संघर्ष नहीं रहता, साधना बन जाता है। और साधक स्वयं एक दीप बनकर अपने आसपास भी प्रकाश बांटने लगता है।

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