निकाय चुनाव में भजनलाल सरकार का पहला बड़ा इम्तिहान
राजस्थान की भजनलाल शर्मा सरकार अब उस राजनीतिक पड़ाव पर है, जहां उसकी परीक्षा विधानसभा के बहुमत से नहीं, गांव और शहर के मतदाता से होगी। निकाय और पंचायतीराज चुनाव भाजपा के लिए स्थानीय संस्थाओं पर कब्जे की लड़ाई भर नहीं हैं। ये सरकार की ढाई साल की कार्यशैली, संगठन की पकड़ और मुख्यमंत्री के राजनीतिक नेतृत्व का पहला व्यापक जमीनी परीक्षण होंगे। सरकार के पास उपलब्धियों और घोषणाओं की लंबी सूची है। फरवरी में मुख्यमंत्री ने अगले वित्त वर्ष में 1.25 लाख सरकारी भर्तियों का लक्ष्य घोषित किया और सरकार का दावा है कि एक लाख से अधिक नियुक्तियां दी जा चुकी हैं। लेकिन स्थानीय चुनावों में आंकड़ों से ज्यादा असर इस बात का होगा कि मतदाता को अपने गांव, कस्बे और वार्ड में सरकार का काम कितना दिखाई देता है।
स्थानीय चुनाव लंबे समय से लंबित हैं। पंचायत चुनाव करीब डेढ़ साल और नगरीय निकाय चुनाव लगभग एक वर्ष की देरी से चल रहे हैं। ओबीसी राजनीतिक प्रतिनिधित्व आयोग की रिपोर्ट 5 अगस्त को सरकार को सौंपे जाने और 8 अगस्त को मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकार किए जाने के बाद चुनाव की राह में मौजूद महत्वपूर्ण बाधा हट चुकी है। इससे पहले हाईकोर्ट चुनाव समय पर कराने को लेकर सरकार और निर्वाचन व्यवस्था पर सख्त रुख दिखा चुका है। अब देरी के लिए प्रशासनिक कारणों की राजनीतिक स्वीकार्यता बहुत कम बची है। यही देरी विपक्ष के हाथ में सबसे आसान हथियार देती है। चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया हैं। यदि निर्वाचित निकायों की जगह लंबे समय तक प्रशासक व्यवस्था चलाते रहें तो सरकार पर राजनीतिक सुविधा के आरोप लगना स्वाभाविक है। इसलिए भाजपा के लिए चुनाव कराना ही पर्याप्त नहीं होगा, उसे यह भी साबित करना होगा कि उसने स्थानीय लोकतंत्र को चुनावी गणित के हिसाब से नहीं चलाया।
भाजपा की सबसे बड़ी पूंजी उसका मजबूत संगठन है। प्रदेश नेतृत्व ने पहले ही चुनावी तैयारी तेज कर दी है। मदन राठौड़ कह चुके हैं कि पार्टी स्थानीय चुनावों के लिए तैयार है। उम्मीदवार चयन में ओबीसी आयोग की रिपोर्ट, वार्डों की सामाजिक संरचना, स्थानीय समीकरण और जीतने की क्षमता को आधार बनाने की तैयारी है। यह रणनीति व्यावहारिक है, लेकिन यहीं से सबसे कठिन राजनीति भी पैदा होगी। आरक्षण और परिसीमन ने अनेक पुराने समीकरण बदल दिए हैं। किसी विधायक का समर्थक टिकट मांग रहा होगा, किसी मंत्री का अपना उम्मीदवार होगा और संगठन वर्षों से काम कर रहे कार्यकर्ता को आगे करना चाहेगा। ऐसे में भाजपा के अनुशासन की असली परीक्षा मंच पर नहीं, टिकट वितरण की मेज पर होगी।
सत्ता में ढाई साल रहने के बाद कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं भी बढ़ती हैं। राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर पार्टी के भीतर समय समय पर आवाजें उठी हैं। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने भी अप्रैल में सार्वजनिक रूप से कहा था कि राजनीतिक नियुक्तियों में निष्ठावान और पुराने कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यह टिप्पणी केवल नियुक्तियों तक सीमित नहीं थी। स्थानीय चुनावों से पहले इसका संदेश स्पष्ट है: कार्यकर्ता अब सत्ता में हिस्सेदारी चाहता है।
सरकार के लिए एक और चुनौती प्रशासनिक पकड़ की है। हाल में वन मंत्री संजय शर्मा को अलवर में सफाईकर्मियों की नियुक्ति के मुद्दे पर अपनी ही सरकार के प्रशासन के खिलाफ धरने पर बैठना पड़ा। एक घटना से पूरी सरकार का आकलन नहीं किया जा सकता, लेकिन उसका राजनीतिक प्रतीक महत्वपूर्ण है। यदि मंत्री को अपनी बात मनवाने के लिए धरना देना पड़े तो विपक्ष प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व के तालमेल पर सवाल जरूर उठाएगा।
नगर निकाय और पंचायत में मतदाता पूछता है कि सड़क कब बनी, पानी कितना आया, कचरा कौन उठा रहा है और पंचायत में सुनवाई हुई या नहीं। यहां सरकार का ब्रांड तभी काम करता है जब उसके साथ स्थानीय अनुभव भी सकारात्मक हो।
भाजपा के लिए खतरा सत्ता विरोधी हवा से अधिक सत्ता और संगठन के बीच पैदा होने वाली दूरी है। यदि टिकट स्थानीय स्वीकार्यता के बजाय सिफारिश से बंटे, पुराने कार्यकर्ता उपेक्षित हुए और प्रशासनिक असंतोष बना रहा तो कांग्रेस को वह राजनीतिक जगह मिल सकती है जिसे वह अपने बल पर शायद तैयार न कर पाए। इसके उलट, भाजपा यदि सरकार की योजनाओं को जमीनी उपलब्धियों में बदलने, मजबूत उम्मीदवार चुनने और संगठन को संतुष्ट रखने में सफल रहती है तो उसका व्यापक नेटवर्क बड़ी बढ़त दे सकता है। लगभग 66 हजार मतदान केंद्रों की चुनावी तैयारी भी यह संकेत देती है कि अब मुकाबला औपचारिकताओं से आगे बढ़कर वास्तविक चुनावी मैदान में पहुंच रहा है।
निकाय और पंचायतीराज चुनाव भजनलाल सरकार का अंतिम रिपोर्ट कार्ड नहीं होंगे, लेकिन पहला ऐसा राजनीतिक एक्सरे जरूर होंगे जिसमें विज्ञापन नहीं, जमीन दिखाई देगी।भाजपा के सामने सवाल साफ है: क्या मजबूत संगठन सरकार के प्रदर्शन को वोट में बदल पाएगा, या स्थानीय असंतोष उसकी सबसे मजबूत चुनावी मशीनरी में पहली दरार दिखाएगा?
राजस्थान की भजनलाल शर्मा सरकार अब उस राजनीतिक पड़ाव पर है, जहां उसकी परीक्षा विधानसभा के बहुमत से नहीं, गांव और शहर के मतदाता से होगी। निकाय और पंचायतीराज चुनाव भाजपा के लिए स्थानीय संस्थाओं पर कब्जे की लड़ाई भर नहीं हैं। ये सरकार की ढाई साल की कार्यशैली, संगठन की पकड़ और मुख्यमंत्री के राजनीतिक नेतृत्व का पहला व्यापक जमीनी परीक्षण होंगे। सरकार के पास उपलब्धियों और घोषणाओं की लंबी सूची है। फरवरी में मुख्यमंत्री ने अगले वित्त वर्ष में 1.25 लाख सरकारी भर्तियों का लक्ष्य घोषित किया और सरकार का दावा है कि एक लाख से अधिक नियुक्तियां दी जा चुकी हैं। लेकिन स्थानीय चुनावों में आंकड़ों से ज्यादा असर इस बात का होगा कि मतदाता को अपने गांव, कस्बे और वार्ड में सरकार का काम कितना दिखाई देता है। स्थानीय चुनाव लंबे समय से लंबित हैं। पंचायत चुनाव करीब डेढ़ साल और नगरीय निकाय चुनाव लगभग एक वर्ष की देरी से चल रहे हैं। ओबीसी राजनीतिक प्रतिनिधित्व आयोग की रिपोर्ट 5 अगस्त को सरकार को सौंपे जाने और 8 अगस्त को मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकार किए जाने के बाद चुनाव की राह में मौजूद महत्वपूर्ण बाधा हट चुकी है। इससे पहले हाईकोर्ट चुनाव समय पर कराने को लेकर सरकार और निर्वाचन व्यवस्था पर सख्त रुख दिखा चुका है। अब देरी के लिए प्रशासनिक कारणों की राजनीतिक स्वीकार्यता बहुत कम बची है। यही देरी विपक्ष के हाथ में सबसे आसान हथियार देती है। चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया हैं। यदि निर्वाचित निकायों की जगह लंबे समय तक प्रशासक व्यवस्था चलाते रहें तो सरकार पर राजनीतिक सुविधा के आरोप लगना स्वाभाविक है। इसलिए भाजपा के लिए चुनाव कराना ही पर्याप्त नहीं होगा, उसे यह भी साबित करना होगा कि उसने स्थानीय लोकतंत्र को चुनावी गणित के हिसाब से नहीं चलाया। भाजपा की सबसे बड़ी पूंजी उसका मजबूत संगठन है। प्रदेश नेतृत्व ने पहले ही चुनावी तैयारी तेज कर दी है। मदन राठौड़ कह चुके हैं कि पार्टी स्थानीय चुनावों के लिए तैयार है। उम्मीदवार चयन में ओबीसी आयोग की रिपोर्ट, वार्डों की सामाजिक संरचना, स्थानीय समीकरण और जीतने की क्षमता को आधार बनाने की तैयारी है। यह रणनीति व्यावहारिक है, लेकिन यहीं से सबसे कठिन राजनीति भी पैदा होगी। आरक्षण और परिसीमन ने अनेक पुराने समीकरण बदल दिए हैं। किसी विधायक का समर्थक टिकट मांग रहा होगा, किसी मंत्री का अपना उम्मीदवार होगा और संगठन वर्षों से काम कर रहे कार्यकर्ता को आगे करना चाहेगा। ऐसे में भाजपा के अनुशासन की असली परीक्षा मंच पर नहीं, टिकट वितरण की मेज पर होगी। सत्ता में ढाई साल रहने के बाद कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं भी बढ़ती हैं। राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर पार्टी के भीतर समय समय पर आवाजें उठी हैं। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने भी अप्रैल में सार्वजनिक रूप से कहा था कि राजनीतिक नियुक्तियों में निष्ठावान और पुराने कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यह टिप्पणी केवल नियुक्तियों तक सीमित नहीं थी। स्थानीय चुनावों से पहले इसका संदेश स्पष्ट है: कार्यकर्ता अब सत्ता में हिस्सेदारी चाहता है। सरकार के लिए एक और चुनौती प्रशासनिक पकड़ की है। हाल में वन मंत्री संजय शर्मा को अलवर में सफाईकर्मियों की नियुक्ति के मुद्दे पर अपनी ही सरकार के प्रशासन के खिलाफ धरने पर बैठना पड़ा। एक घटना से पूरी सरकार का आकलन नहीं किया जा सकता, लेकिन उसका राजनीतिक प्रतीक महत्वपूर्ण है। यदि मंत्री को अपनी बात मनवाने के लिए धरना देना पड़े तो विपक्ष प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व के तालमेल पर सवाल जरूर उठाएगा। नगर निकाय और पंचायत में मतदाता पूछता है कि सड़क कब बनी, पानी कितना आया, कचरा कौन उठा रहा है और पंचायत में सुनवाई हुई या नहीं। यहां सरकार का ब्रांड तभी काम करता है जब उसके साथ स्थानीय अनुभव भी सकारात्मक हो। भाजपा के लिए खतरा सत्ता विरोधी हवा से अधिक सत्ता और संगठन के बीच पैदा होने वाली दूरी है। यदि टिकट स्थानीय स्वीकार्यता के बजाय सिफारिश से बंटे, पुराने कार्यकर्ता उपेक्षित हुए और प्रशासनिक असंतोष बना रहा तो कांग्रेस को वह राजनीतिक जगह मिल सकती है जिसे वह अपने बल पर शायद तैयार न कर पाए। इसके उलट, भाजपा यदि सरकार की योजनाओं को जमीनी उपलब्धियों में बदलने, मजबूत उम्मीदवार चुनने और संगठन को संतुष्ट रखने में सफल रहती है तो उसका व्यापक नेटवर्क बड़ी बढ़त दे सकता है। लगभग 66 हजार मतदान केंद्रों की चुनावी तैयारी भी यह संकेत देती है कि अब मुकाबला औपचारिकताओं से आगे बढ़कर वास्तविक चुनावी मैदान में पहुंच रहा है। निकाय और पंचायतीराज चुनाव भजनलाल सरकार का अंतिम रिपोर्ट कार्ड नहीं होंगे, लेकिन पहला ऐसा राजनीतिक एक्सरे जरूर होंगे जिसमें विज्ञापन नहीं, जमीन दिखाई देगी।भाजपा के सामने सवाल साफ है: क्या मजबूत संगठन सरकार के प्रदर्शन को वोट में बदल पाएगा, या स्थानीय असंतोष उसकी सबसे मजबूत चुनावी मशीनरी में पहली दरार दिखाएगा?
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