स्थानीय चुनाव में कांग्रेस की पहली लड़ाई भीतर
राजस्थान में निकाय और पंचायतीराज चुनाव कांग्रेस के लिए भाजपा से मुकाबले से कहीं अधिक पार्टी के भीतर नेतृत्व, संगठन और टिकट पर नियंत्रण की परीक्षा हैं। 2023 की विधानसभा हार के बाद संगठन को फिर खड़ा करने की कोशिश हुई, लेकिन स्थानीय चुनाव नजदीक आते ही पुराने शक्ति केंद्र सक्रिय दिखाई देने लगे हैं। अशोक गहलोत, सचिन पायलट, गोविंद सिंह डोटासरा और अन्य प्रभावशाली नेताओं के अपने समर्थक और राजनीतिक क्षेत्र हैं। चुनौती नेताओं के प्रभाव की नहीं, उस प्रभाव को संगठनात्मक फैसलों पर हावी होने से रोकने की है।
हाल की घटनाओं ने भीतर की असहजता को सतह पर ला दिया है। पूर्व मंत्री शांति धारीवाल द्वारा अशोक गहलोत को राजस्थान कांग्रेस का "आलाकमान" बताने से प्रदेश में वास्तविक शक्ति केंद्र को लेकर बहस छिड़ी। बाद में गहलोत को स्पष्ट करना पड़ा कि उनके और प्रदेशाध्यक्ष डोटासरा के बीच कोई नाराजगी नहीं है। राजनीति में जब एकजुटता की बार बार व्याख्या करनी पड़े तो सवाल स्वाभाविक रूप से उठते हैं। अब असली परीक्षा टिकट वितरण में होगी। कांग्रेस ने निकाय और पंचायतीराज चुनावों में 50 प्रतिशत टिकट 50 वर्ष से कम उम्र के नेताओं को देने की घोषणा की है। यह फैसला पीढ़ीगत बदलाव का रास्ता खोल सकता है, लेकिन इसकी विश्वसनीयता उम्मीदवारों के चयन से तय होगी। सवाल है कि मौका वर्षों से बूथ, ब्लॉक और जिला स्तर पर काम कर रहे कार्यकर्ताओं को मिलेगा या बड़े नेताओं के परिवारों और समर्थक समूहों से आने वाले चेहरों को?
राजस्थान कांग्रेस में टिकट उम्मीदवार चयन के साथ शक्ति प्रदर्शन का माध्यम भी रहा है। किस जिले में किस नेता की पसंद चलेगी, कौन सा वार्ड किस समर्थक को मिलेगा और स्थानीय संस्थाओं में किस खेमे का दबदबा बढ़ेगा, ये समीकरण अक्सर जीतने की क्षमता से टकराते हैं। निकाय और पंचायत चुनावों में यह चुनौती ज्यादा गंभीर है, क्योंकि दावेदार अधिक हैं और जीत हार का अंतर बहुत छोटा होता है। यहां एक टिकट कटने से केवल उम्मीदवार नाराज नहीं होता। उसके समर्थक, जातीय समीकरण और स्थानीय नेटवर्क भी प्रभावित होते हैं। बागी उम्मीदवार कुछ सौ वोट काटकर परिणाम बदल सकता है। इसलिए कांग्रेस की पहली चुनौती भाजपा नहीं, टिकट वितरण के बाद अपने घर को संभालना होगी।
प्रदेशाध्यक्ष डोटासरा के सामने इसी कारण कठिन परीक्षा है। उन्हें भाजपा सरकार के खिलाफ आक्रामक विपक्ष बनाए रखना है और साथ ही टिकटों को लेकर उठने वाले दबावों से संगठन को बचाना है। गहलोत का पुराना नेटवर्क और राजनीतिक अनुभव मजबूत है। पायलट के पास अपना युवा और कार्यकर्ता आधार है। हरीश चौधरी, टीकाराम जूली सहित कई नेताओं का अपने क्षेत्रों में असर है।
इसलिए राजस्थान कांग्रेस को केवल गहलोत बनाम पायलट की पुरानी कहानी से देखना अब पर्याप्त नहीं है। पार्टी कई शक्ति केंद्रों में बंटी राजनीतिक संरचना है। यह उसके लिए ताकत भी हो सकती है, बशर्ते सभी नेता अपनी ताकत साझा चुनावी रणनीति में लगाएं। यदि स्थानीय चुनाव अपने अपने प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने का माध्यम बने तो यही बहुकेंद्रीय नेतृत्व संगठन को भीतर से कमजोर करेगा।
कांग्रेस के पास भाजपा सरकार को घेरने के लिए स्थानीय मुद्दों की कमी नहीं है। पानी, सड़क, सफाई, ग्रामीण विकास, बेरोजगारी, प्रशासनिक जवाबदेही और स्थानीय चुनावों में हुई देरी जैसे सवाल जनता से सीधे जुड़े हैं। निकाय और पंचायत चुनाव सरकार के कामकाज पर स्थानीय जनमत का रूप ले सकते हैं। मगर प्रभावी मुद्दा भी उस दिन कमजोर पड़ जाता है जब टिकट कटने पर कांग्रेस का नेता ही निर्दलीय मैदान में उतर जाए। यही कारण है कि उम्मीदवार चयन की कसौटी पहले से स्पष्ट होनी चाहिए। स्थानीय स्वीकार्यता, संगठन के लिए काम, जीतने की क्षमता, सामाजिक प्रतिनिधित्व और सार्वजनिक छवि को प्राथमिकता मिले। बड़े नेता की सिफारिश एक राय हो सकती है, टिकट की गारंटी नहीं।
50 प्रतिशत युवा उम्मीदवारों का प्रयोग भी इसी कसौटी पर परखा जाएगा। जमीन पर काम करने वाले नए चेहरों को अवसर मिला तो कांग्रेस गांवों, कस्बों और शहरों में नेतृत्व की नई पंक्ति तैयार कर सकती है। यदि पुराने खेमों ने अपने समर्थकों को ही युवा नेतृत्व के नाम पर आगे कर दिया तो घोषणा राजनीतिक पैकेजिंग बनकर रह जाएगी।
सवाल बिल्कुल साफ है: टिकट कार्यकर्ता को मिलेगा या खेमे को?
यदि कांग्रेस ने योग्यता और संगठन को प्राथमिकता दी तो स्थानीय चुनाव उसके पुनरुद्धार की जमीन तैयार कर सकते हैं। यदि टिकट फिर सिफारिश, गुटीय हिस्सेदारी और प्रभाव क्षेत्र की सौदेबाजी में बंटे तो भाजपा से लड़ाई शुरू होने से पहले ही कांग्रेस अपनी पुरानी बीमारी से घिर जाएगी।
राजस्थान कांग्रेस को इस चुनाव में भाजपा को हराने से पहले अपनी गुटीय राजनीति पर जीत हासिल करनी होगी।
राजस्थान में निकाय और पंचायतीराज चुनाव कांग्रेस के लिए भाजपा से मुकाबले से कहीं अधिक पार्टी के भीतर नेतृत्व, संगठन और टिकट पर नियंत्रण की परीक्षा हैं। 2023 की विधानसभा हार के बाद संगठन को फिर खड़ा करने की कोशिश हुई, लेकिन स्थानीय चुनाव नजदीक आते ही पुराने शक्ति केंद्र सक्रिय दिखाई देने लगे हैं। अशोक गहलोत, सचिन पायलट, गोविंद सिंह डोटासरा और अन्य प्रभावशाली नेताओं के अपने समर्थक और राजनीतिक क्षेत्र हैं। चुनौती नेताओं के प्रभाव की नहीं, उस प्रभाव को संगठनात्मक फैसलों पर हावी होने से रोकने की है। हाल की घटनाओं ने भीतर की असहजता को सतह पर ला दिया है। पूर्व मंत्री शांति धारीवाल द्वारा अशोक गहलोत को राजस्थान कांग्रेस का "आलाकमान" बताने से प्रदेश में वास्तविक शक्ति केंद्र को लेकर बहस छिड़ी। बाद में गहलोत को स्पष्ट करना पड़ा कि उनके और प्रदेशाध्यक्ष डोटासरा के बीच कोई नाराजगी नहीं है। राजनीति में जब एकजुटता की बार बार व्याख्या करनी पड़े तो सवाल स्वाभाविक रूप से उठते हैं। अब असली परीक्षा टिकट वितरण में होगी। कांग्रेस ने निकाय और पंचायतीराज चुनावों में 50 प्रतिशत टिकट 50 वर्ष से कम उम्र के नेताओं को देने की घोषणा की है। यह फैसला पीढ़ीगत बदलाव का रास्ता खोल सकता है, लेकिन इसकी विश्वसनीयता उम्मीदवारों के चयन से तय होगी। सवाल है कि मौका वर्षों से बूथ, ब्लॉक और जिला स्तर पर काम कर रहे कार्यकर्ताओं को मिलेगा या बड़े नेताओं के परिवारों और समर्थक समूहों से आने वाले चेहरों को? राजस्थान कांग्रेस में टिकट उम्मीदवार चयन के साथ शक्ति प्रदर्शन का माध्यम भी रहा है। किस जिले में किस नेता की पसंद चलेगी, कौन सा वार्ड किस समर्थक को मिलेगा और स्थानीय संस्थाओं में किस खेमे का दबदबा बढ़ेगा, ये समीकरण अक्सर जीतने की क्षमता से टकराते हैं। निकाय और पंचायत चुनावों में यह चुनौती ज्यादा गंभीर है, क्योंकि दावेदार अधिक हैं और जीत हार का अंतर बहुत छोटा होता है। यहां एक टिकट कटने से केवल उम्मीदवार नाराज नहीं होता। उसके समर्थक, जातीय समीकरण और स्थानीय नेटवर्क भी प्रभावित होते हैं। बागी उम्मीदवार कुछ सौ वोट काटकर परिणाम बदल सकता है। इसलिए कांग्रेस की पहली चुनौती भाजपा नहीं, टिकट वितरण के बाद अपने घर को संभालना होगी। प्रदेशाध्यक्ष डोटासरा के सामने इसी कारण कठिन परीक्षा है। उन्हें भाजपा सरकार के खिलाफ आक्रामक विपक्ष बनाए रखना है और साथ ही टिकटों को लेकर उठने वाले दबावों से संगठन को बचाना है। गहलोत का पुराना नेटवर्क और राजनीतिक अनुभव मजबूत है। पायलट के पास अपना युवा और कार्यकर्ता आधार है। हरीश चौधरी, टीकाराम जूली सहित कई नेताओं का अपने क्षेत्रों में असर है। इसलिए राजस्थान कांग्रेस को केवल गहलोत बनाम पायलट की पुरानी कहानी से देखना अब पर्याप्त नहीं है। पार्टी कई शक्ति केंद्रों में बंटी राजनीतिक संरचना है। यह उसके लिए ताकत भी हो सकती है, बशर्ते सभी नेता अपनी ताकत साझा चुनावी रणनीति में लगाएं। यदि स्थानीय चुनाव अपने अपने प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने का माध्यम बने तो यही बहुकेंद्रीय नेतृत्व संगठन को भीतर से कमजोर करेगा। कांग्रेस के पास भाजपा सरकार को घेरने के लिए स्थानीय मुद्दों की कमी नहीं है। पानी, सड़क, सफाई, ग्रामीण विकास, बेरोजगारी, प्रशासनिक जवाबदेही और स्थानीय चुनावों में हुई देरी जैसे सवाल जनता से सीधे जुड़े हैं। निकाय और पंचायत चुनाव सरकार के कामकाज पर स्थानीय जनमत का रूप ले सकते हैं। मगर प्रभावी मुद्दा भी उस दिन कमजोर पड़ जाता है जब टिकट कटने पर कांग्रेस का नेता ही निर्दलीय मैदान में उतर जाए। यही कारण है कि उम्मीदवार चयन की कसौटी पहले से स्पष्ट होनी चाहिए। स्थानीय स्वीकार्यता, संगठन के लिए काम, जीतने की क्षमता, सामाजिक प्रतिनिधित्व और सार्वजनिक छवि को प्राथमिकता मिले। बड़े नेता की सिफारिश एक राय हो सकती है, टिकट की गारंटी नहीं। 50 प्रतिशत युवा उम्मीदवारों का प्रयोग भी इसी कसौटी पर परखा जाएगा। जमीन पर काम करने वाले नए चेहरों को अवसर मिला तो कांग्रेस गांवों, कस्बों और शहरों में नेतृत्व की नई पंक्ति तैयार कर सकती है। यदि पुराने खेमों ने अपने समर्थकों को ही युवा नेतृत्व के नाम पर आगे कर दिया तो घोषणा राजनीतिक पैकेजिंग बनकर रह जाएगी। सवाल बिल्कुल साफ है: टिकट कार्यकर्ता को मिलेगा या खेमे को? यदि कांग्रेस ने योग्यता और संगठन को प्राथमिकता दी तो स्थानीय चुनाव उसके पुनरुद्धार की जमीन तैयार कर सकते हैं। यदि टिकट फिर सिफारिश, गुटीय हिस्सेदारी और प्रभाव क्षेत्र की सौदेबाजी में बंटे तो भाजपा से लड़ाई शुरू होने से पहले ही कांग्रेस अपनी पुरानी बीमारी से घिर जाएगी। राजस्थान कांग्रेस को इस चुनाव में भाजपा को हराने से पहले अपनी गुटीय राजनीति पर जीत हासिल करनी होगी।
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