लॉटरी पूरी, अब लोकतंत्र की बारी
राजस्थान में निकाय और पंचायतीराज चुनाव अब उस मोड़ पर खड़े हैं, जहां सरकार, प्रशासन और राज्य निर्वाचन आयोग के सामने सबसे बड़ा प्रश्न प्रक्रिया का नहीं, विश्वसनीयता का है। परिसीमन की लंबी कवायद हो चुकी है, आरक्षण की तस्वीर साफ हो रही है, स्थानीय निकायों और पंचायतीराज संस्थाओं के प्रमुख पदों की राजनीतिक गणित बननी शुरू हो चुकी है। संभावित उम्मीदवार अपने समीकरण साध रहे हैं, दल टिकटों की अंदरूनी चर्चा में जुट गए हैं और कार्यकर्ता मैदान नापने लगे हैं। इतना सब हो जाने के बाद जनता का सवाल बिल्कुल सीधा है, चुनाव की तारीख कब आएगी?
स्थानीय चुनावों को सामान्य राजनीतिक कार्यक्रम मानना भूल होगी। पंचायत और निकाय लोकतंत्र की वह चौखट हैं, जहां आम नागरिक सबसे पहले दस्तक देता है। गांव की सड़क टूटे तो सरपंच से सवाल होता है, नाली जाम हो तो पार्षद को घेरा जाता है, पेयजल संकट हो तो स्थानीय निकाय जवाब देता है और विकास कार्य अटकें तो जनता सीधे अपने चुने हुए प्रतिनिधि तक पहुंचती है। यही व्यवस्था लोकतंत्र को रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़ती है।
लेकिन जब निर्वाचित संस्थाओं की जगह लंबे समय तक प्रशासक व्यवस्था संभालते हैं, तो प्रशासन चलता जरूर है, पर राजनीतिक जवाबदेही कमजोर पड़ती है। अधिकारी आदेश के प्रति जवाबदेह होता है, जनप्रतिनिधि मतदाता के प्रति। यही अंतर स्थानीय लोकतंत्र की आत्मा है।
अब आरक्षण की लॉटरी ने चुनावी राजनीति को नई दिशा दे दी है। किसी नेता की वर्षों की तैयारी एक आरक्षित वार्ड या पद के कारण खत्म हो सकती है, तो किसी नए चेहरे के लिए अवसर खुल सकता है। कांग्रेस और भाजपा दोनों के भीतर टिकट के दावेदार सक्रिय होंगे, जातीय और सामाजिक समीकरण बैठेंगे, पुराने पार्षद और सरपंच नई जमीन तलाशेंगे। लेकिन इस पूरे राजनीतिक शोर के बीच सबसे महत्वपूर्ण पक्ष मतदाता है, जिसकी चर्चा अक्सर सबसे अंत में होती है।
मतदाता को इससे कोई मतलब नहीं कि किस नेता की सीट आरक्षित हुई और किसका समीकरण बिगड़ा। उसे सड़क चाहिए, पानी चाहिए, सफाई चाहिए, विकास चाहिए और सबसे बढ़कर ऐसा प्रतिनिधि चाहिए जिसे पांच साल बाद जवाबदेह ठहराया जा सके।
चुनावों में हुई देरी ने पहले ही कई सवाल खड़े किए हैं। परिसीमन, आरक्षण, मतदाता सूची और प्रशासनिक तैयारियां आवश्यक प्रक्रियाएं हैं, लेकिन इन प्रक्रियाओं की उपयोगिता तभी है जब वे समय पर चुनाव की ओर ले जाएं। यदि यही प्रक्रियाएं बार बार देरी का कारण बनें तो लोकतंत्र के प्रति अविश्वास पैदा होना स्वाभाविक है।
अब सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को एक स्पष्ट, ठोस और समयबद्ध चुनाव कार्यक्रम सामने रखना चाहिए। चुनाव की तारीख को लेकर अनिश्चितता जितनी लंबी चलेगी, उतना ही राजनीतिक संदेह बढ़ेगा। स्थानीय संस्थाओं को निर्वाचित प्रतिनिधियों के बिना चलाना किसी भी स्थिति में स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकती।
राजस्थान की राजनीति को अब यह समझना होगा कि स्थानीय लोकतंत्र किसी दल की सुविधा का विषय नहीं है। सत्ता में रहने वाले दल के लिए चुनाव टालना आसान लग सकता है और विपक्ष को चुनाव की मांग करना राजनीतिक रूप से लाभकारी, लेकिन लोकतांत्रिक सिद्धांत दोनों से ऊपर हैं।
आरक्षण की पर्चियां निकल रही हैं, नेताओं की गणित शुरू हो चुकी है और चुनावी मैदान आकार लेने लगा है। अब जनता को प्रक्रिया नहीं, तारीख चाहिए। बहुत इंतजार हो चुका। राजस्थान के स्थानीय लोकतंत्र की परीक्षा अब इस बात से होगी कि मतदाता को उसका अधिकार कितनी जल्दी और कितनी स्पष्टता से लौटाया जाता है।
राजस्थान में निकाय और पंचायतीराज चुनाव अब उस मोड़ पर खड़े हैं, जहां सरकार, प्रशासन और राज्य निर्वाचन आयोग के सामने सबसे बड़ा प्रश्न प्रक्रिया का नहीं, विश्वसनीयता का है। परिसीमन की लंबी कवायद हो चुकी है, आरक्षण की तस्वीर साफ हो रही है, स्थानीय निकायों और पंचायतीराज संस्थाओं के प्रमुख पदों की राजनीतिक गणित बननी शुरू हो चुकी है। संभावित उम्मीदवार अपने समीकरण साध रहे हैं, दल टिकटों की अंदरूनी चर्चा में जुट गए हैं और कार्यकर्ता मैदान नापने लगे हैं। इतना सब हो जाने के बाद जनता का सवाल बिल्कुल सीधा है, चुनाव की तारीख कब आएगी? स्थानीय चुनावों को सामान्य राजनीतिक कार्यक्रम मानना भूल होगी। पंचायत और निकाय लोकतंत्र की वह चौखट हैं, जहां आम नागरिक सबसे पहले दस्तक देता है। गांव की सड़क टूटे तो सरपंच से सवाल होता है, नाली जाम हो तो पार्षद को घेरा जाता है, पेयजल संकट हो तो स्थानीय निकाय जवाब देता है और विकास कार्य अटकें तो जनता सीधे अपने चुने हुए प्रतिनिधि तक पहुंचती है। यही व्यवस्था लोकतंत्र को रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़ती है। लेकिन जब निर्वाचित संस्थाओं की जगह लंबे समय तक प्रशासक व्यवस्था संभालते हैं, तो प्रशासन चलता जरूर है, पर राजनीतिक जवाबदेही कमजोर पड़ती है। अधिकारी आदेश के प्रति जवाबदेह होता है, जनप्रतिनिधि मतदाता के प्रति। यही अंतर स्थानीय लोकतंत्र की आत्मा है। अब आरक्षण की लॉटरी ने चुनावी राजनीति को नई दिशा दे दी है। किसी नेता की वर्षों की तैयारी एक आरक्षित वार्ड या पद के कारण खत्म हो सकती है, तो किसी नए चेहरे के लिए अवसर खुल सकता है। कांग्रेस और भाजपा दोनों के भीतर टिकट के दावेदार सक्रिय होंगे, जातीय और सामाजिक समीकरण बैठेंगे, पुराने पार्षद और सरपंच नई जमीन तलाशेंगे। लेकिन इस पूरे राजनीतिक शोर के बीच सबसे महत्वपूर्ण पक्ष मतदाता है, जिसकी चर्चा अक्सर सबसे अंत में होती है। मतदाता को इससे कोई मतलब नहीं कि किस नेता की सीट आरक्षित हुई और किसका समीकरण बिगड़ा। उसे सड़क चाहिए, पानी चाहिए, सफाई चाहिए, विकास चाहिए और सबसे बढ़कर ऐसा प्रतिनिधि चाहिए जिसे पांच साल बाद जवाबदेह ठहराया जा सके। चुनावों में हुई देरी ने पहले ही कई सवाल खड़े किए हैं। परिसीमन, आरक्षण, मतदाता सूची और प्रशासनिक तैयारियां आवश्यक प्रक्रियाएं हैं, लेकिन इन प्रक्रियाओं की उपयोगिता तभी है जब वे समय पर चुनाव की ओर ले जाएं। यदि यही प्रक्रियाएं बार बार देरी का कारण बनें तो लोकतंत्र के प्रति अविश्वास पैदा होना स्वाभाविक है। अब सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को एक स्पष्ट, ठोस और समयबद्ध चुनाव कार्यक्रम सामने रखना चाहिए। चुनाव की तारीख को लेकर अनिश्चितता जितनी लंबी चलेगी, उतना ही राजनीतिक संदेह बढ़ेगा। स्थानीय संस्थाओं को निर्वाचित प्रतिनिधियों के बिना चलाना किसी भी स्थिति में स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकती। राजस्थान की राजनीति को अब यह समझना होगा कि स्थानीय लोकतंत्र किसी दल की सुविधा का विषय नहीं है। सत्ता में रहने वाले दल के लिए चुनाव टालना आसान लग सकता है और विपक्ष को चुनाव की मांग करना राजनीतिक रूप से लाभकारी, लेकिन लोकतांत्रिक सिद्धांत दोनों से ऊपर हैं। आरक्षण की पर्चियां निकल रही हैं, नेताओं की गणित शुरू हो चुकी है और चुनावी मैदान आकार लेने लगा है। अब जनता को प्रक्रिया नहीं, तारीख चाहिए। बहुत इंतजार हो चुका। राजस्थान के स्थानीय लोकतंत्र की परीक्षा अब इस बात से होगी कि मतदाता को उसका अधिकार कितनी जल्दी और कितनी स्पष्टता से लौटाया जाता है।
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