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सावन में शिव को जल ही नहीं, अपना अहंकार भी चढ़ाएं
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सावन में शिव को जल ही नहीं, अपना अहंकार भी चढ़ाएं

सावन भगवान शिव की आराधना, भक्ति और आत्मसंयम का पवित्र महीना है। हर ओर हरियाली, मंदिरों में गूंजता “ॐ नमः शिवाय”, कांवड़ यात्राएं, जलाभिषेक, बिल्वपत्र, व्रत और पूजा, ये सब सावन की पहचान हैं। लेकिन यदि शिव की उपासना को केवल पूजा-पद्धति तक सीमित कर दिया जाए, तो उसका आध्यात्मिक अर्थ अधूरा रह जाता है। शिव केवल जल चढ़ाने से प्रसन्न होने वाले देव नहीं, वे संयम, त्याग, धैर्य और भीतर की अशुद्धियों को भस्म करने की प्रेरणा भी हैं। समुद्र मंथन से निकला विष शिव ने स्वयं पी लिया, लेकिन संसार को उससे बचाए रखा। यही सावन का सबसे बड़ा संदेश है, जीवन में आने वाली कटुता, क्रोध और विषाद को दूसरों पर न उड़ेलें, बल्कि अपने भीतर उसे साधने की शक्ति पैदा करें। जिस प्रकार शिव ने हलाहल को कंठ में रोक लिया, उसी प्रकार मनुष्य भी अपनी वाणी, क्रोध और अहंकार पर नियंत्रण रखे तो जीवन का बहुत-सा विष अपने आप शांत हो सकता है।
सावन में भगवान शिव को जल चढ़ाना शुभ माना गया है, पर इसके साथ किसी प्यासे को पानी पिलाना भी उतना ही पुण्य है। बिल्वपत्र अर्पित करना श्रद्धा है, तो किसी दुखी व्यक्ति को सांत्वना देना भी शिव आराधना ही है। सोमवार का व्रत रखा जाए, मंदिर जाया जाए, रुद्राभिषेक किया जाए, शिव मंत्र का जाप किया जाए लेकिन साथ ही एक बुरी आदत छोड़ने का संकल्प भी लिया जाए। कोई क्रोध कम करे, कोई नशा छोड़े, कोई कटु वाणी से बचे, कोई छल-कपट त्यागे, कोई जरूरतमंद की सहायता करे। तभी सावन केवल कैलेंडर का धार्मिक महीना नहीं, बल्कि जीवन को भीतर से बदलने वाला तप बनता है। शिव हमें यही सिखाते हैं कि शक्ति शोर में नहीं, संयम में है। इसलिए इस सावन भगवान शिव को जल जरूर चढ़ाएं, पर अपने भीतर के अहंकार, क्रोध और द्वेष को भी उनके चरणों में अर्पित करें। यही सावन की सबसे सार्थक साधना होगी।

सावन भगवान शिव की आराधना, भक्ति और आत्मसंयम का पवित्र महीना है। हर ओर हरियाली, मंदिरों में गूंजता “ॐ नमः शिवाय”, कांवड़ यात्राएं, जलाभिषेक, बिल्वपत्र, व्रत और पूजा, ये सब सावन की पहचान हैं। लेकिन यदि शिव की उपासना को केवल पूजा-पद्धति तक सीमित कर दिया जाए, तो उसका आध्यात्मिक अर्थ अधूरा रह जाता है। शिव केवल जल चढ़ाने से प्रसन्न होने वाले देव नहीं, वे संयम, त्याग, धैर्य और भीतर की अशुद्धियों को भस्म करने की प्रेरणा भी हैं। समुद्र मंथन से निकला विष शिव ने स्वयं पी लिया, लेकिन संसार को उससे बचाए रखा। यही सावन का सबसे बड़ा संदेश है, जीवन में आने वाली कटुता, क्रोध और विषाद को दूसरों पर न उड़ेलें, बल्कि अपने भीतर उसे साधने की शक्ति पैदा करें। जिस प्रकार शिव ने हलाहल को कंठ में रोक लिया, उसी प्रकार मनुष्य भी अपनी वाणी, क्रोध और अहंकार पर नियंत्रण रखे तो जीवन का बहुत-सा विष अपने आप शांत हो सकता है। सावन में भगवान शिव को जल चढ़ाना शुभ माना गया है, पर इसके साथ किसी प्यासे को पानी पिलाना भी उतना ही पुण्य है। बिल्वपत्र अर्पित करना श्रद्धा है, तो किसी दुखी व्यक्ति को सांत्वना देना भी शिव आराधना ही है। सोमवार का व्रत रखा जाए, मंदिर जाया जाए, रुद्राभिषेक किया जाए, शिव मंत्र का जाप किया जाए लेकिन साथ ही एक बुरी आदत छोड़ने का संकल्प भी लिया जाए। कोई क्रोध कम करे, कोई नशा छोड़े, कोई कटु वाणी से बचे, कोई छल-कपट त्यागे, कोई जरूरतमंद की सहायता करे। तभी सावन केवल कैलेंडर का धार्मिक महीना नहीं, बल्कि जीवन को भीतर से बदलने वाला तप बनता है। शिव हमें यही सिखाते हैं कि शक्ति शोर में नहीं, संयम में है। इसलिए इस सावन भगवान शिव को जल जरूर चढ़ाएं, पर अपने भीतर के अहंकार, क्रोध और द्वेष को भी उनके चरणों में अर्पित करें। यही सावन की सबसे सार्थक साधना होगी।

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