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भाजपा में नियुक्तियों की देरी, इंतजार अब राजनीतिक सवाल
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भाजपा में नियुक्तियों की देरी, इंतजार अब राजनीतिक सवाल

राजस्थान में भाजपा की सरकार बने लंबा समय हो चुका है, लेकिन राजनीतिक नियुक्तियों का इंतजार अभी भी बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और नेताओं को बेचैन किए हुए है। बोर्ड, निगम, आयोग और अन्य संस्थाओं में होने वाली नियुक्तियां केवल पद बांटने की प्रक्रिया नहीं होतीं। इनके जरिए संगठन अपने कार्यकर्ताओं को सत्ता में हिस्सेदारी का संदेश देता है। यही वजह है कि देरी अब प्रशासनिक नहीं, राजनीतिक सवाल बनती जा रही है।

भाजपा की ताकत हमेशा उसके संगठन और कार्यकर्ता आधारित ढांचे को माना गया है। चुनाव में बूथ से लेकर प्रदेश स्तर तक सक्रिय रहने वाले कार्यकर्ता सरकार बनने के बाद स्वाभाविक रूप से अपेक्षा रखते हैं कि उनकी मेहनत की राजनीतिक पहचान भी होगी। लेकिन जब नियुक्तियां लंबी खिंचती हैं तो सबसे पहले असंतोष उसी कार्यकर्ता वर्ग में पैदा होता है, जो सत्ता की लड़ाई में सबसे नीचे तक काम करता है।

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के सामने चुनौती आसान नहीं है। सरकार को एक तरफ प्रशासनिक कामकाज संभालना है, दूसरी तरफ संगठन के भीतर अलग अलग स्तर के नेताओं और सामाजिक समूहों का संतुलन भी साधना है। राजस्थान भाजपा में केवल एक शक्ति केंद्र नहीं है। केंद्रीय नेतृत्व, प्रदेश संगठन, वरिष्ठ नेता, पूर्व मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक और क्षेत्रीय प्रभाव वाले नेता अपनी अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं रखते हैं। नियुक्तियों में देरी का एक कारण यह व्यापक संतुलन साधने की कोशिश भी माना जा सकता है। यही संतुलन जितना जरूरी है, उतना ही जोखिमपूर्ण भी।

राजनीतिक नियुक्ति में हर नाम के साथ क्षेत्र, जाति, संगठन में योगदान, नेतृत्व से निकटता और भविष्य की चुनावी उपयोगिता जैसे सवाल जुड़ते हैं। किसी एक वर्ग को अधिक प्रतिनिधित्व देने पर दूसरे वर्ग की नाराजगी का खतरा रहता है। लेकिन सभी को संतुष्ट करने की कोशिश में निर्णय ही टलता रहे तो उसका नुकसान अधिक बड़ा होता है।

भाजपा नेतृत्व के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि संगठन के पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं को कितनी जगह मिलेगी। यदि महत्वपूर्ण पद केवल चुनावी प्रभाव या बड़े राजनीतिक नामों के आधार पर भरे जाते हैं तो वर्षों से संगठन में काम कर रहे लोगों के बीच निराशा बढ़ सकती है। दूसरी तरफ सरकार को ऐसे चेहरों की भी आवश्यकता होती है जो संबंधित संस्थाओं को प्रभावी ढंग से चला सकें।

राजनीतिक नियुक्तियों का एक व्यावहारिक पक्ष भी है। अनेक बोर्ड और निगम सरकार की नीतियों को जमीन तक पहुंचाने में भूमिका निभाते हैं। यदि लंबे समय तक वहां राजनीतिक नेतृत्व नहीं आता तो उनकी सक्रियता और राजनीतिक संवाद दोनों प्रभावित होते हैं। इसलिए नियुक्तियों को केवल पुरस्कार समझना भी सही नहीं है।

विपक्ष स्वाभाविक रूप से इस देरी को भाजपा के भीतर असहमति और खींचतान से जोड़ने की कोशिश करेगा। कांग्रेस के लिए यह कहना आसान है कि भाजपा अपने ही नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच हिस्सेदारी तय नहीं कर पा रही। ऐसे आरोपों का सबसे प्रभावी जवाब बयान नहीं, समय पर निर्णय हो सकता है।

भाजपा नेतृत्व को यह भी समझना होगा कि कार्यकर्ता का धैर्य अनंत नहीं होता। सत्ता में हिस्सेदारी का अर्थ हर कार्यकर्ता को पद देना नहीं है, लेकिन यह भरोसा जरूर होना चाहिए कि संगठन में उसकी मेहनत देखी जा रही है और निर्णय की कोई स्पष्ट प्रक्रिया है।

लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच पार्टी संगठन लगातार राजनीतिक परीक्षा से गुजरता रहता है। आने वाले स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों जैसे मुकाबलों में भी वही कार्यकर्ता मैदान में उतरेंगे जो आज नियुक्तियों को लेकर प्रतीक्षा में हैं। लंबे इंतजार से पैदा हुई उदासीनता चुनाव के समय आसानी से उत्साह में नहीं बदलती।

भजनलाल सरकार और प्रदेश भाजपा के लिए अब राजनीतिक नियुक्तियां केवल सूची जारी करने का मामला नहीं रह गई हैं। यह संगठनात्मक संदेश का प्रश्न है। किसे अवसर मिलता है, उससे अधिक महत्वपूर्ण यह होगा कि पार्टी यह भरोसा पैदा कर पाए कि अवसर का आधार योगदान, क्षमता और राजनीतिक संतुलन है।

राजनीति में खाली पद लंबे समय तक खाली नहीं रहते। वे धीरे धीरे असंतोष, अफवाह और गुटीय दावेदारी से भरने लगते हैं। राजस्थान भाजपा के लिए बेहतर यही होगा कि नियुक्तियों पर अनिश्चितता समाप्त हो और कार्यकर्ताओं को स्पष्ट संदेश मिले कि सत्ता और संगठन के बीच उनकी भूमिका केवल चुनाव तक सीमित नहीं है।

राजस्थान में भाजपा की सरकार बने लंबा समय हो चुका है, लेकिन राजनीतिक नियुक्तियों का इंतजार अभी भी बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और नेताओं को बेचैन किए हुए है। बोर्ड, निगम, आयोग और अन्य संस्थाओं में होने वाली नियुक्तियां केवल पद बांटने की प्रक्रिया नहीं होतीं। इनके जरिए संगठन अपने कार्यकर्ताओं को सत्ता में हिस्सेदारी का संदेश देता है। यही वजह है कि देरी अब प्रशासनिक नहीं, राजनीतिक सवाल बनती जा रही है। भाजपा की ताकत हमेशा उसके संगठन और कार्यकर्ता आधारित ढांचे को माना गया है। चुनाव में बूथ से लेकर प्रदेश स्तर तक सक्रिय रहने वाले कार्यकर्ता सरकार बनने के बाद स्वाभाविक रूप से अपेक्षा रखते हैं कि उनकी मेहनत की राजनीतिक पहचान भी होगी। लेकिन जब नियुक्तियां लंबी खिंचती हैं तो सबसे पहले असंतोष उसी कार्यकर्ता वर्ग में पैदा होता है, जो सत्ता की लड़ाई में सबसे नीचे तक काम करता है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के सामने चुनौती आसान नहीं है। सरकार को एक तरफ प्रशासनिक कामकाज संभालना है, दूसरी तरफ संगठन के भीतर अलग अलग स्तर के नेताओं और सामाजिक समूहों का संतुलन भी साधना है। राजस्थान भाजपा में केवल एक शक्ति केंद्र नहीं है। केंद्रीय नेतृत्व, प्रदेश संगठन, वरिष्ठ नेता, पूर्व मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक और क्षेत्रीय प्रभाव वाले नेता अपनी अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं रखते हैं। नियुक्तियों में देरी का एक कारण यह व्यापक संतुलन साधने की कोशिश भी माना जा सकता है। यही संतुलन जितना जरूरी है, उतना ही जोखिमपूर्ण भी। राजनीतिक नियुक्ति में हर नाम के साथ क्षेत्र, जाति, संगठन में योगदान, नेतृत्व से निकटता और भविष्य की चुनावी उपयोगिता जैसे सवाल जुड़ते हैं। किसी एक वर्ग को अधिक प्रतिनिधित्व देने पर दूसरे वर्ग की नाराजगी का खतरा रहता है। लेकिन सभी को संतुष्ट करने की कोशिश में निर्णय ही टलता रहे तो उसका नुकसान अधिक बड़ा होता है। भाजपा नेतृत्व के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि संगठन के पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं को कितनी जगह मिलेगी। यदि महत्वपूर्ण पद केवल चुनावी प्रभाव या बड़े राजनीतिक नामों के आधार पर भरे जाते हैं तो वर्षों से संगठन में काम कर रहे लोगों के बीच निराशा बढ़ सकती है। दूसरी तरफ सरकार को ऐसे चेहरों की भी आवश्यकता होती है जो संबंधित संस्थाओं को प्रभावी ढंग से चला सकें। राजनीतिक नियुक्तियों का एक व्यावहारिक पक्ष भी है। अनेक बोर्ड और निगम सरकार की नीतियों को जमीन तक पहुंचाने में भूमिका निभाते हैं। यदि लंबे समय तक वहां राजनीतिक नेतृत्व नहीं आता तो उनकी सक्रियता और राजनीतिक संवाद दोनों प्रभावित होते हैं। इसलिए नियुक्तियों को केवल पुरस्कार समझना भी सही नहीं है। विपक्ष स्वाभाविक रूप से इस देरी को भाजपा के भीतर असहमति और खींचतान से जोड़ने की कोशिश करेगा। कांग्रेस के लिए यह कहना आसान है कि भाजपा अपने ही नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच हिस्सेदारी तय नहीं कर पा रही। ऐसे आरोपों का सबसे प्रभावी जवाब बयान नहीं, समय पर निर्णय हो सकता है। भाजपा नेतृत्व को यह भी समझना होगा कि कार्यकर्ता का धैर्य अनंत नहीं होता। सत्ता में हिस्सेदारी का अर्थ हर कार्यकर्ता को पद देना नहीं है, लेकिन यह भरोसा जरूर होना चाहिए कि संगठन में उसकी मेहनत देखी जा रही है और निर्णय की कोई स्पष्ट प्रक्रिया है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच पार्टी संगठन लगातार राजनीतिक परीक्षा से गुजरता रहता है। आने वाले स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों जैसे मुकाबलों में भी वही कार्यकर्ता मैदान में उतरेंगे जो आज नियुक्तियों को लेकर प्रतीक्षा में हैं। लंबे इंतजार से पैदा हुई उदासीनता चुनाव के समय आसानी से उत्साह में नहीं बदलती। भजनलाल सरकार और प्रदेश भाजपा के लिए अब राजनीतिक नियुक्तियां केवल सूची जारी करने का मामला नहीं रह गई हैं। यह संगठनात्मक संदेश का प्रश्न है। किसे अवसर मिलता है, उससे अधिक महत्वपूर्ण यह होगा कि पार्टी यह भरोसा पैदा कर पाए कि अवसर का आधार योगदान, क्षमता और राजनीतिक संतुलन है। राजनीति में खाली पद लंबे समय तक खाली नहीं रहते। वे धीरे धीरे असंतोष, अफवाह और गुटीय दावेदारी से भरने लगते हैं। राजस्थान भाजपा के लिए बेहतर यही होगा कि नियुक्तियों पर अनिश्चितता समाप्त हो और कार्यकर्ताओं को स्पष्ट संदेश मिले कि सत्ता और संगठन के बीच उनकी भूमिका केवल चुनाव तक सीमित नहीं है।

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