कांग्रेस की असली लड़ाई भाजपा से पहले अपने भीतर
राजस्थान कांग्रेस की राजनीति को समझने के लिए केवल उसके सार्वजनिक कार्यक्रम देखना काफी नहीं है। असली तस्वीर उन दूरियों, संकेतों और अलग अलग शक्ति केंद्रों में दिखाई देती है, जो पिछले कई वर्षों से पार्टी की दिशा तय करते रहे हैं। सत्ता जाने के बाद भी कांग्रेस इस आंतरिक खिंचाव से पूरी तरह बाहर नहीं निकल सकी है।
अशोक गहलोत आज भी राजस्थान कांग्रेस में सबसे अनुभवी और प्रभावशाली नेताओं में हैं। तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके गहलोत की संगठन, विधायकों और पुराने कांग्रेस नेटवर्क पर पकड़ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दूसरी तरफ सचिन पायलट लंबे समय से उस पीढ़ी का चेहरा बने हुए हैं, जो मानती है कि पार्टी में नेतृत्व का स्वाभाविक हस्तांतरण अब और नहीं टलना चाहिए। यहीं से कांग्रेस की असली राजनीति शुरू होती है। गहलोत खेमा यह मानता रहा है कि चुनाव केवल चेहरे से नहीं, संगठन, जातीय समीकरण और बूथ स्तर की पकड़ से जीते जाते हैं। पायलट समर्थक इसके उलट यह तर्क देते हैं कि नई पीढ़ी, आक्रामक राजनीति और स्पष्ट नेतृत्व के बिना कांग्रेस भविष्य की लड़ाई नहीं जीत सकती। दोनों तर्कों में दम है, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब यही मतभेद पार्टी की साझा रणनीति पर भारी पड़ने लगें।
कांग्रेस की गुटबाजी अब पहले जैसी खुली लड़ाई के रूप में कम दिखाई देती है। 2020 जैसी बगावत, बयानबाजी और सार्वजनिक टकराव फिलहाल नहीं है। लेकिन राजनीतिक संकेत अभी भी स्पष्ट हैं। किस कार्यक्रम में कौन जाता है, किस मुद्दे पर कौन पहले बयान देता है, किस नेता के समर्थक सोशल मीडिया पर किसे आगे बढ़ाते हैं और किस दौरे में किन चेहरों को जगह मिलती है, राजस्थान कांग्रेस में इन सबका अपना अर्थ निकाला जाता है।
प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व की मुश्किल भी यहीं है। उसे एक तरफ वरिष्ठ नेताओं का सम्मान बनाए रखना है और दूसरी तरफ नई पीढ़ी को यह भरोसा भी देना है कि संगठन में उसके लिए वास्तविक जगह है। यदि प्रदेश नेतृत्व किसी एक खेमे के करीब दिखाई देता है तो दूसरा खेमा स्वाभाविक रूप से दूरी बनाने लगता है। इस बीच भाजपा सरकार के खिलाफ कांग्रेस के पास मुद्दों की कमी नहीं है। कानून व्यवस्था, बेरोजगारी, किसान, बिजली, पानी, भर्ती परीक्षाएं, छात्र राजनीति, स्थानीय निकायों की स्थिति और ग्रामीण प्रशासन जैसे विषय विपक्ष के लिए मजबूत राजनीतिक जमीन बन सकते हैं। लेकिन कांग्रेस कई बार इन मुद्दों को राज्यव्यापी आंदोलन में बदलने के बजाय अलग अलग नेताओं के कार्यक्रमों तक सीमित कर देती है। यही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक चूक है। जनता विपक्ष से यह नहीं देखती कि किस नेता की सभा में कितनी भीड़ थी। जनता यह देखती है कि सरकार के खिलाफ कौन सा मुद्दा लगातार और प्रभावी ढंग से उठाया गया। यदि कांग्रेस का हर बड़ा नेता अपनी राजनीतिक लाइन पर चलता रहेगा तो पार्टी के पास कई आवाजें तो होंगी, लेकिन एक संदेश नहीं होगा।
गहलोत को किनारे करके कांग्रेस मजबूत नहीं हो सकती। उनका अनुभव, सामाजिक समीकरणों की समझ और प्रशासनिक राजनीति का ज्ञान आज भी उपयोगी है। लेकिन पायलट को अनिश्चित प्रतीक्षा में रखकर भी पार्टी आगे नहीं बढ़ सकती। उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा अब कोई छिपी हुई बात नहीं है और उनके समर्थकों का धैर्य भी असीमित नहीं हो सकता। कांग्रेस हाईकमान की पुरानी शैली रही है कि राजस्थान के नेतृत्व प्रश्न को अंतिम समय तक टाला जाए। यही टालमटोल कई बार समझौते के बजाय प्रतिस्पर्धा को और गहरा कर देती है। जब भूमिका स्पष्ट नहीं होती तो हर नेता भविष्य की संभावना को ध्यान में रखकर अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने लगता है।
राजस्थान कांग्रेस को अब यह तय करना होगा कि वह अगला चुनाव पुराने संतुलन के भरोसे लड़ना चाहती है या स्पष्ट राजनीतिक संरचना के साथ। वरिष्ठ नेताओं की भूमिका, नई पीढ़ी की जगह और संगठन की स्वतंत्रता तीनों पर साफ संदेश जरूरी है। पार्टी के लिए सबसे बड़ा खतरा यह नहीं है कि उसके भीतर महत्वाकांक्षी नेता हैं। हर बड़े दल में होते हैं। खतरा यह है कि कहीं ये महत्वाकांक्षाएं साझा राजनीतिक लक्ष्य से बड़ी न हो जाएं। आज राजस्थान कांग्रेस की लड़ाई दो स्तरों पर है। बाहर भाजपा से और भीतर अपने भविष्य की दिशा को लेकर। बाहर की लड़ाई जीतने के लिए भीतर की लड़ाई को खत्म करना जरूरी नहीं, लेकिन उसे नियंत्रित और व्यवस्थित करना जरूर जरूरी है।
राजस्थान कांग्रेस की राजनीति को समझने के लिए केवल उसके सार्वजनिक कार्यक्रम देखना काफी नहीं है। असली तस्वीर उन दूरियों, संकेतों और अलग अलग शक्ति केंद्रों में दिखाई देती है, जो पिछले कई वर्षों से पार्टी की दिशा तय करते रहे हैं। सत्ता जाने के बाद भी कांग्रेस इस आंतरिक खिंचाव से पूरी तरह बाहर नहीं निकल सकी है। अशोक गहलोत आज भी राजस्थान कांग्रेस में सबसे अनुभवी और प्रभावशाली नेताओं में हैं। तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके गहलोत की संगठन, विधायकों और पुराने कांग्रेस नेटवर्क पर पकड़ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दूसरी तरफ सचिन पायलट लंबे समय से उस पीढ़ी का चेहरा बने हुए हैं, जो मानती है कि पार्टी में नेतृत्व का स्वाभाविक हस्तांतरण अब और नहीं टलना चाहिए। यहीं से कांग्रेस की असली राजनीति शुरू होती है। गहलोत खेमा यह मानता रहा है कि चुनाव केवल चेहरे से नहीं, संगठन, जातीय समीकरण और बूथ स्तर की पकड़ से जीते जाते हैं। पायलट समर्थक इसके उलट यह तर्क देते हैं कि नई पीढ़ी, आक्रामक राजनीति और स्पष्ट नेतृत्व के बिना कांग्रेस भविष्य की लड़ाई नहीं जीत सकती। दोनों तर्कों में दम है, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब यही मतभेद पार्टी की साझा रणनीति पर भारी पड़ने लगें। कांग्रेस की गुटबाजी अब पहले जैसी खुली लड़ाई के रूप में कम दिखाई देती है। 2020 जैसी बगावत, बयानबाजी और सार्वजनिक टकराव फिलहाल नहीं है। लेकिन राजनीतिक संकेत अभी भी स्पष्ट हैं। किस कार्यक्रम में कौन जाता है, किस मुद्दे पर कौन पहले बयान देता है, किस नेता के समर्थक सोशल मीडिया पर किसे आगे बढ़ाते हैं और किस दौरे में किन चेहरों को जगह मिलती है, राजस्थान कांग्रेस में इन सबका अपना अर्थ निकाला जाता है। प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व की मुश्किल भी यहीं है। उसे एक तरफ वरिष्ठ नेताओं का सम्मान बनाए रखना है और दूसरी तरफ नई पीढ़ी को यह भरोसा भी देना है कि संगठन में उसके लिए वास्तविक जगह है। यदि प्रदेश नेतृत्व किसी एक खेमे के करीब दिखाई देता है तो दूसरा खेमा स्वाभाविक रूप से दूरी बनाने लगता है। इस बीच भाजपा सरकार के खिलाफ कांग्रेस के पास मुद्दों की कमी नहीं है। कानून व्यवस्था, बेरोजगारी, किसान, बिजली, पानी, भर्ती परीक्षाएं, छात्र राजनीति, स्थानीय निकायों की स्थिति और ग्रामीण प्रशासन जैसे विषय विपक्ष के लिए मजबूत राजनीतिक जमीन बन सकते हैं। लेकिन कांग्रेस कई बार इन मुद्दों को राज्यव्यापी आंदोलन में बदलने के बजाय अलग अलग नेताओं के कार्यक्रमों तक सीमित कर देती है। यही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक चूक है। जनता विपक्ष से यह नहीं देखती कि किस नेता की सभा में कितनी भीड़ थी। जनता यह देखती है कि सरकार के खिलाफ कौन सा मुद्दा लगातार और प्रभावी ढंग से उठाया गया। यदि कांग्रेस का हर बड़ा नेता अपनी राजनीतिक लाइन पर चलता रहेगा तो पार्टी के पास कई आवाजें तो होंगी, लेकिन एक संदेश नहीं होगा। गहलोत को किनारे करके कांग्रेस मजबूत नहीं हो सकती। उनका अनुभव, सामाजिक समीकरणों की समझ और प्रशासनिक राजनीति का ज्ञान आज भी उपयोगी है। लेकिन पायलट को अनिश्चित प्रतीक्षा में रखकर भी पार्टी आगे नहीं बढ़ सकती। उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा अब कोई छिपी हुई बात नहीं है और उनके समर्थकों का धैर्य भी असीमित नहीं हो सकता। कांग्रेस हाईकमान की पुरानी शैली रही है कि राजस्थान के नेतृत्व प्रश्न को अंतिम समय तक टाला जाए। यही टालमटोल कई बार समझौते के बजाय प्रतिस्पर्धा को और गहरा कर देती है। जब भूमिका स्पष्ट नहीं होती तो हर नेता भविष्य की संभावना को ध्यान में रखकर अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने लगता है। राजस्थान कांग्रेस को अब यह तय करना होगा कि वह अगला चुनाव पुराने संतुलन के भरोसे लड़ना चाहती है या स्पष्ट राजनीतिक संरचना के साथ। वरिष्ठ नेताओं की भूमिका, नई पीढ़ी की जगह और संगठन की स्वतंत्रता तीनों पर साफ संदेश जरूरी है। पार्टी के लिए सबसे बड़ा खतरा यह नहीं है कि उसके भीतर महत्वाकांक्षी नेता हैं। हर बड़े दल में होते हैं। खतरा यह है कि कहीं ये महत्वाकांक्षाएं साझा राजनीतिक लक्ष्य से बड़ी न हो जाएं। आज राजस्थान कांग्रेस की लड़ाई दो स्तरों पर है। बाहर भाजपा से और भीतर अपने भविष्य की दिशा को लेकर। बाहर की लड़ाई जीतने के लिए भीतर की लड़ाई को खत्म करना जरूरी नहीं, लेकिन उसे नियंत्रित और व्यवस्थित करना जरूर जरूरी है।
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