Barmer ई-पेपर ↗
जयपुर की राजनीति, गांव के सवाल
यह ख़बर पृष्ठ 2 पर जैसी छपी। पूरा पाठ पढ़ने के लिए ऊपर “पाठ में पढ़ें” दबाएँ।

जयपुर की राजनीति, गांव के सवाल

राजस्थान की राजनीति में आरोप, प्रत्यारोप, बयान और राजनीतिक रणनीतियों की कोई कमी नहीं है। सरकार अपनी उपलब्धियां गिनाती है, विपक्ष कमियां तलाशता है और नेताओं के वक्तव्य रोज सुर्खियां बनते हैं। मगर इन सबके बीच वह नागरिक कहीं पीछे छूट जाता है, जिसकी राजनीति से पहली अपेक्षा बहुत साधारण है। उसके गांव में पानी आए, सड़क ठीक हो, अस्पताल में डॉक्टर मिले, स्कूल में शिक्षक हों और सरकारी दफ्तर में उसका काम समय पर हो।

असल में लोकतंत्र का सबसे बड़ा सवाल यही है कि सत्ता का असर धरातल पर कितना दिखाई देता है।

राजस्थान का भूगोल जितना विशाल है, उसकी स्थानीय समस्याएं भी उतनी ही अलग हैं। पश्चिमी राजस्थान में पेयजल, लंबी दूरियां, चिकित्सा सेवाएं, ग्रामीण सड़कें और सीमावर्ती इलाकों की बुनियादी सुविधाएं प्रमुख चिंता हैं। दूसरे क्षेत्रों में सिंचाई, रोजगार, बिजली, परिवहन और स्थानीय प्रशासन से जुड़े सवाल अलग रूप में सामने आते हैं। इसलिए पूरे प्रदेश की राजनीति को केवल जयपुर के राजनीतिक विमर्श से समझना अधूरा दृष्टिकोण होगा।

सरकार के लिए केवल नई योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं है। असली सफलता तब मानी जाएगी जब स्वीकृत बजट और सरकारी योजना का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। कागज पर बनी सड़क जमीन पर भी बने, पाइपलाइन से वास्तव में पानी आए और अस्पताल की इमारत के साथ डॉक्टर भी मौजूद हो।
>राजनीति की असली परीक्षा भाषण में नहीं, उस नल में है जिसमें पानी आता है और उस अस्पताल में है जहां मरीज को डॉक्टर मिलता है।

यहीं प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न सामने आता है। कई बार समस्या संसाधनों की नहीं, बल्कि निगरानी की होती है। फाइल आगे नहीं बढ़ती, शिकायत का निस्तारण औपचारिक हो जाता है और नागरिक एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक घूमता रहता है। ऐसी स्थिति में बड़ी घोषणाओं का प्रभाव भी कमजोर पड़ जाता है।

विपक्ष की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। केवल सरकार की आलोचना करना विपक्ष का अंतिम उद्देश्य नहीं हो सकता। स्थानीय समस्याओं को तथ्य, दस्तावेज और समाधान के साथ उठाना अधिक प्रभावी राजनीति है। किसी मुद्दे पर एक दिन का राजनीतिक प्रदर्शन सुर्खियां बना सकता है, लेकिन किसी गांव की वर्षों पुरानी समस्या का समाधान जनता लंबे समय तक याद रखती है।

स्थानीय जनप्रतिनिधियों को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। विधायक, सांसद, नगर निकाय और पंचायत प्रतिनिधि केवल चुनाव के समय जनता के बीच दिखाई देने वाले चेहरे नहीं हैं। वे नागरिक और शासन व्यवस्था के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं।

राजस्थान की राजनीति के मूल्यांकन की कसौटी अब बदलनी चाहिए। किस नेता ने कितना बड़ा बयान दिया, उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उसके क्षेत्र में कितनी समस्याएं हल हुईं।

चुनाव पांच वर्ष में एक बार होते हैं, लेकिन शासन की परीक्षा हर दिन होती है। जनता अंततः वही राजनीति चाहती है जो उसके दरवाजे तक पहुंचे। पानी, सड़क, स्कूल, अस्पताल और समय पर न्यायसंगत प्रशासन भले ही राजनीतिक मंच पर छोटे विषय लगें, लेकिन आम नागरिक के लिए यही सबसे बड़े राजनीतिक मुद्दे हैं।

राजस्थान की राजनीति में आरोप, प्रत्यारोप, बयान और राजनीतिक रणनीतियों की कोई कमी नहीं है। सरकार अपनी उपलब्धियां गिनाती है, विपक्ष कमियां तलाशता है और नेताओं के वक्तव्य रोज सुर्खियां बनते हैं। मगर इन सबके बीच वह नागरिक कहीं पीछे छूट जाता है, जिसकी राजनीति से पहली अपेक्षा बहुत साधारण है। उसके गांव में पानी आए, सड़क ठीक हो, अस्पताल में डॉक्टर मिले, स्कूल में शिक्षक हों और सरकारी दफ्तर में उसका काम समय पर हो। असल में लोकतंत्र का सबसे बड़ा सवाल यही है कि सत्ता का असर धरातल पर कितना दिखाई देता है। राजस्थान का भूगोल जितना विशाल है, उसकी स्थानीय समस्याएं भी उतनी ही अलग हैं। पश्चिमी राजस्थान में पेयजल, लंबी दूरियां, चिकित्सा सेवाएं, ग्रामीण सड़कें और सीमावर्ती इलाकों की बुनियादी सुविधाएं प्रमुख चिंता हैं। दूसरे क्षेत्रों में सिंचाई, रोजगार, बिजली, परिवहन और स्थानीय प्रशासन से जुड़े सवाल अलग रूप में सामने आते हैं। इसलिए पूरे प्रदेश की राजनीति को केवल जयपुर के राजनीतिक विमर्श से समझना अधूरा दृष्टिकोण होगा। सरकार के लिए केवल नई योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं है। असली सफलता तब मानी जाएगी जब स्वीकृत बजट और सरकारी योजना का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। कागज पर बनी सड़क जमीन पर भी बने, पाइपलाइन से वास्तव में पानी आए और अस्पताल की इमारत के साथ डॉक्टर भी मौजूद हो। >राजनीति की असली परीक्षा भाषण में नहीं, उस नल में है जिसमें पानी आता है और उस अस्पताल में है जहां मरीज को डॉक्टर मिलता है। यहीं प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न सामने आता है। कई बार समस्या संसाधनों की नहीं, बल्कि निगरानी की होती है। फाइल आगे नहीं बढ़ती, शिकायत का निस्तारण औपचारिक हो जाता है और नागरिक एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक घूमता रहता है। ऐसी स्थिति में बड़ी घोषणाओं का प्रभाव भी कमजोर पड़ जाता है। विपक्ष की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। केवल सरकार की आलोचना करना विपक्ष का अंतिम उद्देश्य नहीं हो सकता। स्थानीय समस्याओं को तथ्य, दस्तावेज और समाधान के साथ उठाना अधिक प्रभावी राजनीति है। किसी मुद्दे पर एक दिन का राजनीतिक प्रदर्शन सुर्खियां बना सकता है, लेकिन किसी गांव की वर्षों पुरानी समस्या का समाधान जनता लंबे समय तक याद रखती है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। विधायक, सांसद, नगर निकाय और पंचायत प्रतिनिधि केवल चुनाव के समय जनता के बीच दिखाई देने वाले चेहरे नहीं हैं। वे नागरिक और शासन व्यवस्था के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। राजस्थान की राजनीति के मूल्यांकन की कसौटी अब बदलनी चाहिए। किस नेता ने कितना बड़ा बयान दिया, उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उसके क्षेत्र में कितनी समस्याएं हल हुईं। चुनाव पांच वर्ष में एक बार होते हैं, लेकिन शासन की परीक्षा हर दिन होती है। जनता अंततः वही राजनीति चाहती है जो उसके दरवाजे तक पहुंचे। पानी, सड़क, स्कूल, अस्पताल और समय पर न्यायसंगत प्रशासन भले ही राजनीतिक मंच पर छोटे विषय लगें, लेकिन आम नागरिक के लिए यही सबसे बड़े राजनीतिक मुद्दे हैं।

← पूरा पृष्ठ देखें
© Barmer · डिजिटल ई-पेपर संस्करण